गुरु गोविन्द सिंह || सिखों के दसवें गुरु

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  गुरु नानक ने सिक्ख मत का संस्थापन किया। गुरु अङ्गद, गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुन देव, गुरु हरगोविन्द, गुरु हर राय, गुरु हरकिशन, गुरु तेगबहादुर तथा गुरु गोविन्द सिंह उनके उत्तराधिकारी थे ।

गुरु गोविन्द सिंह || सिखों के दसवें गुरु

गुरु अंगद ने सिक्खों को एक पन्थ या सम्प्रदाय के रूप में संघटित किया। उन्होंने एक वृहद् पैमाने पर एक सार्वजनिक भोजनालय या लंगर की व्यस्था की जिसके द्वार सभी मतों तथा वर्गों के लिए उन्मुक्त रहते थे। उन्होंने यह नियम बना दिया था कि जो भी उनके दर्शन के लिए आयेगा, उसको उनके लंगर में निःशुल्क भोजन करना अनिवार्य होगा। उनका यह नियम जाति-भेद के प्रति उनकी अवज्ञा का ही द्योतक था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र- ये सभी बिना किसी भेद-भाव के वहाँ एक पंगत या पंक्ति में बैठ कर भोजन करते थे।


चौथे गुरु रामदास ने सोचा कि एक ऐसे स्थान का होना नितान्त आवश्यक है जहाँ सिक्ख समय-समय पर एकत्र हो कर विचार-विनिमय कर सकें। उन्होंने रामदासपुर में एक पुराने तालाब का जीर्णोद्धार कर उसको अमृतसर के नाम से अभिहित कर दिया। अमृतसर का अर्थ होता है अमृत या अमरत्व का कुण्ड। इसके मध्य में उन्होंने है एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया। उन्होंने रामदासपुर का नाम बदल कर उस तालाब के नाम पर अमृतसर कर दिया और अब वह स्वर्ण मन्दिर सिक्खों का मुख्यालय हो गया है। इस प्रकार सिक्खों का एक पृथक् समुदाय संघटित हो गया।


रामदास के पुत्र पंचम गुरु अर्जुन ने सिक्खों के पवित्र ग्रन्थ " ग्रन्थ साहिब" का संकलन किया और अमृतसर के स्वर्ण-मन्दिर में आदरपूर्वक विराजमान कर दिया। यह ग्रन्थ सिक्खों के लिए 'बाइबिल' तथा 'गीता' है। सिक्ख मत के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहा। उन्होंने सिक्खों को एक समुदाय में संघटित किया ।


कई कारणों से गुरु अर्जुन तथा जहाँगीर एक-दूसरे के शत्रु हो गये। १६०६ ई. में गुरु अर्जुन पर राजद्रोह का अभियोग लगा कर उनको घोर यन्त्रणा देने के पश्चात् उनकी हत्या कर दी गयी। 

गुरु अर्जुन ने अपने पुत्र हरगोविन्द को गुरु-गद्दी पर पदासीन कर दिया। वह सिक्खों के छठे गुरु थे। उन्हें जहाँगीर ने बारह वर्षों तक कारागृह में रखा। हर राय सप्तम गुरु थे । अष्टम गुरु हरकिशन का युवावस्था में ही देहान्त हो गया।


गुरु गोविन्द का जन्म

गुरु हर राय के पुत्र तेगबहादुर नौवें गुरु थे। उन्होंने आनन्दपुर नामक एक नया नगर बसाया। गुरु गोविन्द सिंह उनके एकलौते पुत्र थे। उनका जन्म १६६६ ई. में पटना में हुआ था।


अल्पायु में ही वह समवयस्क बालकों का सैन्य दल बना कर उसके सेना-नायक हो जाया करते थे। कृत्रिम धनुष-बाण तथा अन्य शस्त्रास्त्र उनके खिलौने थे। लड़ाइयों का स्वाँग तथा सैनिक व्यायाम उनके प्रिय खेल थे। उन्होंने बालकों के एक नियमित सैन्य दल का संघटन कर लिया था। बालकों का यह दल उनको अपना नायक मानता था। उन्होंने इन बालकों की शक्ति, सहनशीलता तथा उनके सैन्य कौशल के परीक्षण के लिए उनकी दो टोलियों का संघटन किया था जो एक-दूसरे की प्रतिद्वन्द्वी होती थीं।


गुरु गोविन्द की विशेषताएँ

गुरु गोविन्द सिंह एक योद्धा सन्त थे। उनका हृदय शौर्य तथा धैर्य से ओत-प्रोत था। उन्होंने समस्त पंजाब तथा सिक्ख समुदाय को विरोचित मनोवेग तथा सैनिक भावना से अनुप्राणित कर दिया। उनके शब्दों में तोपों की गर्जना तथा लौह उपकरणों की आपसी टकराहट की गूंज होती थी जो लोगों के हृदय में सामरिक ऊर्जा की सृष्टि कर देती थी। पंजाब के इस महान् जन नायक की उपस्थिति में कायर भी शूरवीर बन जाता था। गुरु गोविन्द एक चमत्कारिक सन्त सेनानायक थे। उनके शब्दों से शक्ति की देवी अर्थात् माता शक्ति की साँसों की सुरभि निःसृत होती थी। उन्होंने खालसा बन्धुत्व का सुसंहत शिलान्यास किया और लोगों को जन-सेवा के लिए होठों पर मुस्कान लिये आत्मोसर्ग की शिक्षा दी।


गुरु गोविन्द सिंह प्रचण्ड व्यक्तित्व के स्वामी थे। वह एक अतिमानव थे। वह भूलुण्ठित को भी शीर्षस्थ कर दिया करते थे। उनकी ओजमयी उपस्थिति में दुर्बलता भी अपराजेय शक्ति में रूपान्तरित हो जाती थी। उनकी दीप्तिमयी तलवार अन्यायी - अनाचारी लोगों को आतङ्कित कर देती थी। मृत्यु के प्रति उनके मन में प्रगाढ़ प्रेम था। वह इस सत्य से परिचित थे कि आत्मा अमर्त्य है ।


गुरु गोविन्द सिंह के शिष्य सन्त थे जो युद्ध-क्षेत्र में भी ईश्वर से विलग नहीं होते थे । उनको ईश्वर के ध्यान के लिए पद्मासन या सिद्धासन-जैसे आसनों की आवश्यकता नहीं होती थी। जब वे उत्पीड़ितों तथा असहायों के रक्षार्थ युद्धरत होते थे, तब वे समाधिस्थ हो कर अर्थात् एकाग्र भाव से शत्रु के विरुद्ध संघर्ष करते थे।


गुरु गोविन्द सिंह देश-भक्त मात्र न हो कर कवि, दार्शनिक तथा पैगम्बर भी थे। बाल्यावस्था में ही उनमें उदात्त भावों तथा महान् उद्देश्यों के चिह्न परिलक्षित होने लगे थे। नौ वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने अपने पिता के समक्ष सत्य तथा धर्म-निष्ठा की बलिवेदी पर अपना शीश अर्पित करने का प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया था। एक बार कश्मीर के पण्डित परामर्श तथा सहयोग के लिए तेगबहादुर के पास आये। उन्होंने उनसे कहा कि किसी भी मूल्य पर उनके धर्म की रक्षा होनी चाहिए।


औरङ्गजेब के प्रतिनिधि ने उन पण्डितों से कहा कि उनको इस्लाम तथा मृत्यु में से किसी एक को चुनना है। तेगबहादुर ने सोचा कि यदि कोई विशुद्ध तथा पवित्र व्यक्ति अपने प्राणों की बलि दे दे, तो हिन्दुत्व की रक्षा हो सकती है। इससे धर्मान्ध सम्राट् की आँखें भी खुल सकती हैं। उन्होंने सोचा कि वहाँ उनसे भी पवित्र लोग हैं। वह दुःखी और चिन्ताग्रस्त हो गये। उनके अल्प-वयस्क पुत्र ने उनके दुःख तथा उनकी चिन्ता के कारण का पता लगा कर उनसे कहा- “मेरे पूज्य पिता, इस धरती पर आपसे अधिक महान् तथा पवित्र कौन है ?" पुत्र के इन शब्दों ने पिता की समस्या का समाधान प्रस्तुत कर दिया। अपने पुत्र के इस उपशामक तथा निर्भान्त उत्तर से तेगबहादुर के निश्चय में और अधिक दृढ़ता आ गयी ।


जब गोविन्द राय को गुरु-गद्दी पर पदासीन किया गया, तब उनकी आयु केवल नौ वर्ष थीं। जब उनके यज्ञोपवीत की बात चली, तब उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य अत्याचारियों को दण्डित एवं उन्मूलित करना है और उनके इस अभियान में इस पवित्र सूत्र की भाँति तलवार ही उनको सहायता प्रदान करेगी।


गुरु गोविन्द सिंह गुरुमुखी, संस्कृत तथा फारसी के महान् विद्वान् थे। वह कवियों तथा सुसंस्कृत व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करते थे। उन्होंने भगवान् राम, भगवान् कृष्ण तथा अर्जुन की प्रेरणादायी कहानियों को हिन्दी में पद्यबद्ध करने के लिए अनेक कवियों को नियुक्त कर लिया था। उन्होंने स्वयं भी हिन्दी कविताएँ लिखीं जो आज भी अप्रतिम समझी जाती है।


गुरु गोविन्द सिंह ने शेर से लड़ते हुए अपनी तलवार से उसे मार डाला था।


गुरु गोविन्द का विवाह

जीतो, सुन्दरी तथा साहित देवी (Sahit Devi) - गुरु की ये तीन पलियाँ थीं। उनके चार पुत्र थे। वरिष्ठतम पुत्र अजित सिंह सुन्दरी का पुत्र था जीतो ने तीन पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम जोरावर सिंह, जुझार सिंह तथा फतह सिंह थे। जब साहित देवी ने सन्तान प्राप्ति की इच्छा प्रकट की, तब गुरु गोविन्द सिंह ने कहा कि समग्र खालसा राष्ट्र उसको माता समझेगा। अतः उनको खालसा की माता कहा जाने लगा।


गुरु की भेंट

काबुल के दुनीचन्द नामक एक सिक्ख ने गुरु को भेंट में एक राजसी शिविर दिया था। इस शिविर पर मनोहर दृश्यों की सुनहली- रूपहली कढ़ाई की गयी थी। तीर्थाटन पर निकला आसाम का राजा रतन सिंह गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए आनन्दपुर आया उसने गुरु को भेंट स्वरूप पाँच घोड़े, एक पञ्चकला और एक विलक्षण हाथी दिया। पञ्चकला में गदा, भाला, तलवार, छुरा तथा पिस्तौल समवेत रूप में समाविष्ट थे और हाथी में उसके ललाट से ले कर पूँछ तक एक श्वेत धारी थी। वह गुरु के ऊपर पंखा झलता उनके पद-प्रक्षालन के समय अपने शुण्ड से जल-पात्र पकड़े रहता, तौलिये से उसके पैर पोंछता, उनके जूतों को ठीक करता तथा उनके धनुष से निकल चुके बाणों को वापस ले आता। राजा राम राय ने उन्हें एक बहुमूल्य सिंहासन भी भेंट किया जिसकी एक कमानी को दबाते ही कठपुतलियाँ बाहर आ कर खेल दिखाने लगती थीं।


भीमचन्द से लड़ाई

गुरु गोविन्द सिंह ने अपने सैनिकों की संख्या में वृद्धि की उन्होंने यमुना तट पर पौंटा नामक एक दुर्ग का निर्माण किया।


गुरु की महिमा में अधिकाधिक वृद्धि होती गयी। उन्होंने अपने अनुयायियों को सन्त सैनिक बनाया। उन्होंने अपनी सेना में सैनिक कवायद की एक नयी विधि तथा युद्ध के एक नये नगाड़े का प्रवर्तन किया। उनकी सेना में प्रतिदिन नये-नये अभ्यर्थियों का नामांकन होने लगा। भेंट के रूप में गुरु को बहुसंख्यक घोड़े तथा शस्त्रास्त्र प्राप्त हुए। किसी भी रूप में सम्राट् द्वारा उत्पीड़ित वीर तथा साहसी योद्धा गुरु गोविन्द सिंह के यहाँ एकत्र होने लगे और उन्हें सैन्य विज्ञान में प्रशिक्षित तथा अनुशासित किया जाने लगा ।


पर्वतीय राज्यों के अधिपति उनकी समृद्धि तथा समुन्नति को सतर्क दृष्टि से देख रहे थे। बिलासपुर का राजा भीमचन्द, जिसके राज्य-क्षेत्र के अन्तर्गत उस समय गुरु का निवास था, उनसे ईर्ष्या करने लगा। उसने परसादी नामक हाथी को पाने के लिए अनेक कुत्सित प्रयत्न किये; किन्तु उसके सारे प्रयत्न निष्फल होते गये।


तत्पश्चात् राजा ने एक सन्देश के माध्यम से गुरु से कहा कि वह उसके पास हाथी भेज दें और यदि उन्होंने हाथी नहीं भेजा, तो उन्हें उसके राज्य से निष्कासित कर दिया जायेगा। राजा ने उनके नगाड़े के स्वर के प्रति भी अपनी आपत्ति व्यक्त की। उसने इसे अपनी प्रभु-सत्ता के विरुद्ध एक चुनौती मान लिया। गुरु ने राजा से कहा—“एक अनश्वर स्रष्टा के अतिरिक्त मुझे अन्य कोई आदेश नहीं दे सकता । मैं तुम्हारे राज्य की सीमा के अन्तर्गत नहीं रहता। मैं उस नगर में रहता हूँ जिसे मेरे पिता ने स्वर्ण दे कर खरीदा था। मैं परसादी को तुम्हारे हवाले नहीं कर सकता। मैं तुमसे युद्ध के लिए सर्वदा उद्यत हूँ। मुझे तुम्हारी धमकियों का कोई भय नहीं है।" उनके इन शब्दों से राजा अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और १६८२ ई. में उसने उन पर आक्रमण कर दिया। इस लड़ाई में भीमचन्द पराजित हुआ और उसके बहुते से सैनिक मारे गये।


भङ्गानी की लड़ाई

एक अन्य अवसर पर पर्वतीय राजाओं ने गुरु की सेना पर आक्रमण कर दिया। भीमचन्द उनका नेता था । भङ्गानी में घोर युद्ध हुआ। दोनों ओर के बहुसंख्यक सैनिक मारे गये । गुरु की सेना को विजय प्राप्त हुई और विपक्षियों को पलायन करना पड़ा।


चाम कौर की लड़ाई

औरङ्गजेब ने सरहिन्द के सूबेदार वजीर खाँ को आनन्दपुर को अपने अधिकार में लेने तथा गुरु को दरबार में ले आने का आदेश दिया। इस अवसर पर अनेक सिक्खों ने गुरु का साथ छोड़ दिया; किन्तु गुरु ने अपने शेष निष्ठावान् सैनिकों को साथ ले कर शाही सेना के विरुद्ध युद्ध किया।


चाम कौर में भीषण युद्ध हुआ। गुरु के दो वरिष्ठतम पुत्र साहब अजित सिंह और साहब जोरावर सिंह ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए युद्ध-भूमि पर अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया। उनके कनिष्ठतम दो पुत्र अपनी पितामही के साथ बच कर निकल गये।


सरसा नदी के पास हुई विनाश-लीला के पश्चात् गुरु का वृद्ध ब्राह्मण रसोइया गङ्गाराम उनके दो पुत्रों, जुझार सिंह तथा फतह सिंह और गुरु की माता को ले कर अपने घर चला गया। उस समय जुझार सिंह तथा फतह सिंह की आयु क्रमशः आठ वर्ष तथा छह वर्ष थी। इन लोगों के पास रुपये तथा जवाहरात थे जिन्हें अवसर का लाभ उठा कर गङ्गाराम ने चुरा लिया। गुरु माता ने उसके इस दुर्व्यवहार के लिए उसकी भर्त्सना की जिससे क्रुद्ध हो कर उसने उन लोगों को अपने घर से निकाल दिया । उस विश्वासघाती ने उनकी गिरफ्तारी के लिए उनके आगमन की सूचना पुलिस को पहले ही दे दी थी। उन्हें सरहिन्द के सूबेदार वजीर खाँ के पास ले जाया गया जिसने उन्हें इस्लाम धर्म ग्रहण करने को कहा। गुरु के पुत्रों ने उसके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनको जीवितावस्था में ही सरहिन्द में पत्थर की दीवारों के बीच दफना दिया गया।


इस शोक- समाचार से गुरु विचलित नहीं हो सके। उन्होंने कहा- "विनाश मेरे पुत्रों का नहीं, सरहिन्द का होगा।"


मुक्तसर की लड़ाई

मुक्तसर में गुरु तथा सम्राट् की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। उनका परित्याग कर जो लोग चले गये थे, उनको अपने कुकृत्य पर पश्चात्ताप हुआ और वे लोग पुनः उनके साथ हो गये । गुरु विजयी हुए। औरङ्गजेब ने उन्हें आश्वासन देते हुए उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने की इच्छा प्रकट की। गुरु ने उसके पास एक जफरनामा अर्थात् पद्य-बद्ध पत्र लिखा जिसमें उन्होंने उस पर विश्वासघात तथा दुरङ्गी चाल का दोषारोपण करते हुए कहा कि उनको उसके उस व्यवसाय पर विश्वास नहीं है जिसे वह धर्म के नाम पर चला रहा है। यह पत्र सम्राट् के लिए मर्मस्पर्शी सिद्ध हुआ। इसके पश्चात् १७०७ ई. में शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गयी।


खालसा का जन्म

गुरु गोविन्द सिंह ने सिक्खों की एक बैठक में कहा—“मैं पाँच सिक्खों के शिर चाहता हूँ ।" इसे सुन कर वहाँ एकत्र सभी लोग स्तब्ध रह गये । लाहौर के एक खत्री सिक्ख ने आगे बढ़ कर कहा- "हे गुरु, हे सच्चे बादशाह, मैं आपको अपना शिर अर्पित करता हूँ ।" गुरु उसे एक बड़े शामियाने के भीतर ले गये। बाहर बैठे लोगों को तलवार के प्रहार का स्वर सुनायी पड़ा। इसके साथ ही उन लोगों ने शामियाने से निकलती हुई रक्त की धारा भी देखी। इसके पश्चात् गुरु हाथ में रक्तरंजित तलवार लिये बाहर आये और अपने स्थान पर बैठ गये। अब उन्होंने बलि के लिए दूसरे व्यक्ति की माँग की। धन्ना नामक एक जाट ने आगे बढ़ कर स्वयं को उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिया। गुरु उसे भी शामियाने में ले गये जहाँ उसके साथ भी वही व्यवहार हुआ जो दयाराम के साथ किया जा चुका था। इसके पश्चात् हिमना (Himnah) कहार, साहब राम नाई तथा मोहकम चन्द रंगरेज ने अपने शिर अर्पित किये।


कुछ क्षणों के पश्चात् गुरु उन पाँचों व्यक्तियों के साथ बाहर आये। वे पाँचों पूर्ववत् स्वस्थ सकुशल थे। शामियाने में पाँच बकरियों को मारा गया था। गुरु गोविन्द सिंह ने उन पाँचों चयनित व्यक्तियों के समक्ष जीवन के यथार्थ सिद्धान्तों की व्याख्या की। उनको कच्छा आदि श्वेत वस्त्र पहना कर उनके हाथों में कृपाण दे दिये गये। वे 'वाहे गुरु' का जप करते हुए गुरु के सामने खड़े हो गये। गुरु ने एक लौह-पात्र में नदी का शुद्ध जल भर कर उसमें कुछ बताशे डाले और उन्हें दो धार वाले कृपाण से हिला-डुला कर उस जल में भली-भाँति मिला दिया। इसके पश्चात् उन्होंने घोषित किया कि उन्होंने अमृत तैयार कर लिया है। उन्होंने उसे उन पाँचों व्यक्तियों के ऊपर छिड़क कर उसे पिला दिया। उन्होंने उन्हें आदेश दिया कि वे अपने नाम के आगे 'सिंह' शब्द लगाया करें। वे पाँचों उनके प्रथम दीक्षित शिष्य हुए।


इन चुने गये उत्कृष्ट शिष्यों को "पंज प्यारे" कहा गया। खालसा पन्थ में इनको विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इन लोगों ने गुरु के पट्ट शिष्यों के रूप में धर्म के प्रचार-प्रसार में गुरु को महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। खालसा का अमृत या उसका दीक्षा-संस्कार कोई व्यक्ति लम्बे-लम्बे बालों से ही खालसा नहीं बन जाता। उसे स्वयं में नैतिक तथा आध्यात्मिक शक्ति स्फुरित करने के लिए 'अमृत पान' कर दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।


नव-दीक्षित व्यक्ति अपने हाथ में कृपाण धारण करता है। वह पवित्र ग्रन्थ के सम्मुख खड़ा हो कर 'वाहे गुरु' का निरन्तर जप करता रहता है। उसके पास केश,कच्छा, कंघा, कड़ा तथा कृपाण का होना अत्यावश्यक है।


नदी से विशुद्ध जल लाया जाता है। इसके पश्चात् उसे एक स्वच्छ लौह पात्र में डाल कर उसमें बताशे डालते हैं और उन बताशों को दो धार वाले कृपाण से हिला-डुला कर पानी में भली विधि मिला देते हैं। ऐसा करते समय 'वाहे गुरु' का जप करना चाहिए। इस अवसर पर 'जपुजी' का पाठ भी अनिवार्य है। 'अमृत' तैयार करने वालों को निष्ठावान् 'सिंह' तथा निष्कलुष-चरित्र होना चाहिए। इन लोगों की संख्या पाँच होती है।


अंजुली में उस 'अमृत' को भर कर नव-दीक्षित व्यक्ति की आँखों तथा उसके मुख-मण्डल पर पाँच बार छिड़का जाता है। इसके बाद इसका छिड़काव पाँच बार उनके शिर के केशों पर भी होता है। दीक्षा समारोह की समाप्ति के पश्चात् उसे इस सत्य से परिचित करा दिया जाता है कि उसका पुनर्जन्म हुआ है और माता शिव कौर तथा गुरु गोविन्द सिंह ही क्रमशः उसके माता-पिता है।


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नव-दीक्षित व्यक्ति अब एक नये जीवन में प्रवेश करता है और उसे कड़ा प्रसाद दिया जाता है।


गुरु गोविन्द के अन्तिम दिन

गुरु गोविन्द सिंह तलवण्डी साहब में नौ महीनों तक रहे और इसे एक विद्यापीठ का रूप प्रदान कर इसको गुरु-काशी नाम से अभिहित कर दिया। यहाँ मौखिक रूप से 'आदि ग्रन्थ साहिब' की प्रतिलिपि तैयारी की गयी और उसमें गुरु तेगबहादुर की कविताओं को समाविष्ट कर लिया गया।


गुरु गोविन्द सिंह ने दक्षिण की यात्रा की। उधर निजाम के राज्य में वह स्थायी रूप से नान्देड़ में रहने लगे। उन्होंने नान्देड़ को एक दूसरे आनन्दपुर में रूपान्तरित कर दिया।


नान्देड़ में जब एक दिन वह अपने शिविर में अकेले सो रहे थे, तब एक पठान ने उन्हें छुरा मार दिया। गुरु तत्काल उठ गये और अपने कृपाण से उन्होंने उसे मार डाला। कुछ दिनों के पश्चात् १७०८ ई. में उनका देहान्त हो गया। उस समय उनकी आयु बयालीस वर्ष थी ।


गुरु के अन्तिम शब्द थे— “मैं अपने खालसा को अनश्वर ईश्वर के हाथों सौंप रहा हूँ। पवित्र 'ग्रन्थ साहिब' से ही अब तुम लोगों को मार्ग-दर्शन प्राप्त होगा। अमर्त्य सत्ता अर्थात् परमात्मा के आदेशानुसार ही खालसा पन्थ का प्रारम्भ हुआ था। मैं सारे सिक्खों को 'ग्रन्थ साहिब' को अपने गुरु के रूप में स्वीकार तथा सम्मानित करने का आदेश देता हूँ।"


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