गुरु हरगोविन्द || सिखों के छठे गुरु

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 गुरु अर्जुन के पुत्र गुरु हरगोविन्द का जन्म १५७५ ई. में जनपद अमृतसर-स्थित बहाली में हुआ था। ग्यारह वर्ष की अल्पायु में ही उनको गुरु गद्दी पर पदासीन कर दिया गया। योद्धा तथा सन्त- उनमें इन दोनों की विशेषताएँ विद्यमान थीं। वह सेनाध्यक्ष के साथ-साथ आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक भी हो गये। वह ऐसे प्रथम गुरु थे जिन्होंने सैन्य- तन्त्र का संघटन कर अपने अनुयायियों को युद्ध-क्षेत्र में शौर्य-प्रदर्शन के लिए शस्त्र - सज्जित किया। उन्होंने शूरवीरों की सेवाएँ प्राप्त कर उनको सैन्य-विज्ञान में प्रशिक्षित किया और उन लोगों ने अल्प काल में ही परिपक्व सैनिक हो कर योद्धाओं के एक दल का संघटन कर लिया। गुरु हरगोविन्द उन हिन्दुओं की सुरक्षा के आश्वस्ति- केन्द्र बन गये जो किसी विवशता से ग्रस्त हो कर इस्लाम धर्म-ग्रहण की बात सोच रहे थे।


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अपनी शारीरिक तथा मानसिक संरचना के कारण सिक्खों के नव-पदासीन आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक अपने पिता की इच्छा-पूर्ति तथा सैन्य-संचालन, दोनों अभियानों के लिए सर्वथा उपयुक्त थे। वह अपने पूर्ववर्ती गुरुओं की भाँति रज्जु तथा पगड़ी नहीं धारण करते थे। इनके स्थान पर वह शस्त्र तथा कवच धारण कर सूर्य की भाँति तेजोमय प्रतीत होते थे। उन्होंने अपने योद्धाओं को अश्व तथा शस्त्र प्रदान किये थे ।


गुरु ने भेंट तथा धर्म-शुल्क संग्रहित करने वाले अपने मसन्दों (Masands) को एक विज्ञप्ति के माध्यम से यह सूचित कर दिया कि यदि वे लोग धन के स्थान पर शस्त्रों तथा अश्वों की भेंट का संग्रह करेंगे, तो उनको अधिक प्रसन्नता होगी। धर्म-शुल्क-समार्हताओं ने पूर्व-प्रथानुसार उनके समक्ष एक मंजी (चारपाई), एक सेली (फकीरों द्वारा धारण किया जाने वाला एक ऊनी धागा), एक टोपी, एक पुस्तक तथा एक माला की भेंट प्रस्तुत की। गुरु ने इस भेंट को अस्वीकार करते हुए कहा – “मैं माला के सिद्धान्त को तलवार के सिद्धान्त में रूपान्तरित करने जा रहा हूँ। ईश्वरानुमोदित मत का परिरक्षण ही मेरा लक्ष्य है जो शस्त्राभाव में असम्भव है। मैं फकीर के संकेत-चिह्न सेली तथा टोपी का सर्वदा के लिए परित्याग कर अपने दोनों हाथों में एक-एक तलवार धारण करूँगा। मेरी एक तलवार फकीरी की परिचायिका होगी जो आध्यात्मिकता का प्रतीक है और दूसरी तलवार राजकीय वैभव की परिचायिका होगी जो क्षणिक प्रभुत्व की प्रतीक है।”


चन्दू शाह अपने घोरतम शत्रु के पुत्र की अधिकाधिक बढ़ती हुई शक्ति को देख कर सतर्क हो गया । उसने हरगोविन्द से समझौते का अन्तिम प्रयास करते हुए उन्हें अपनी अभी तक अविवाहित पुत्री से विवाह करने के लिए प्रलोभित किया। इसके साथ ही उसने उन्हें यह धमकी भी दी कि यदि उन्होंने इस विवाह के प्रति अपनी सहमति नहीं प्रदान की, तो उनके प्रति भी वह वही व्यवहार करेगा जो उसने उनके पिता के प्रति किया था । हरगोविन्द ने चन्दू शाह के प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए उसे पत्र द्वारा यह धमकी दी कि उनके पिता को जो यन्त्रणाएँ दी गयी थी, उनके लिए वह उससे भयंकर प्रतिशधि लग। उन्होंन लिखा "तुम पर निम्न जाति के लोग पदत्राण का प्रहार कर तुम्हें अनाहत-अपमानित करेंगे और तुम्हें धूल-धूसरित तथा पददलित हो कर शरीर त्याग करना होगा। "


हरगोविन्द ने अमृतसर के सिक्ख-मन्दिर के सम्मुख अकाल बंगा का निर्माण किया। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि जब वह हर मन्दिर में रहें, तब उन्हें सन्त और जब अकाल बंगा में रहें, तब राजा समझना चाहिए। वह बहुमूल्य तथा राजोचित वस्त्र धारण करते थे। उन्होंने एक आदेश-पत्र द्वारा सिक्खों को निर्देश दिया कि उनकी सामान्य तीर्थयात्राओं के अवसर पर उन्हें शस्त्रास्त्र की ही भेंट अर्पित की जाये।


हरगोविन्द ने सम्राट् का विश्वास प्राप्त कर लिया। उनके यहाँ आठ सौ अश्वारोही तथा बहुसंख्यक शस्त्र-सज्जित अनुयायी रहते थे। वह कश्मीर- यात्रा के अवसर पर सम्राट् की राजकीय सेना का अनुसरण करते थे। सम्राट् ने उन्हें नलगढ़ के राजा ताराचन्द को पराजित करने के लिए नियुक्त किया जो अभी तक अपराजेय था। गुरु ने उसे पराजित कर सम्राट् के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया जिसके पुरस्कार-स्वरूप उन्हें नयी-नयी उपाधियों से सम्मानित कर एक सहस्र अश्वारोहियों तथा सैनिकों का नायक बना दिया गया। उन्हें न्यायिक अधिकार भी प्रदान किये गये। एक आध्यात्मिक गुरु तथा अस्थायी न्यायाधीश के रूप में उनकी जनप्रियता के कारण उनकी शक्ति तथा ख्याति में अधिकाधिक वृद्धि होती गयी। लोग उन्हें 'सच्चा बादशाह' तथा 'सोढ़ी सुलतान' कहने लगे। वह उनके वास्तविक राजा थे। एक बार आखेट के समय उन्होंने सम्राट् की प्राण-रक्षा की। सम्राट् ने सुना था कि वह मृगया में दक्ष थे; अतः जब वह आखेट पर निकला, तब उसने उन्हें अपने साथ ले लिया। एक आहत शेर ने उस पर आक्रमण कर दिया; किन्तु गुरु ने तलवार से उस शेर को मार डाला ।


हरगोविन्द का हृदय उदारता तथा दानशीलता से ओत-प्रोत था। उनके यहाँ एक वृहद लंगर अर्थात्-पाकशाला की व्यवस्था थी जिसमें सहस्रों हिन्दू-मुसलमान भोजन किया करते थे ।


हरगोविन्द ने अनेक सार्वजनिक संस्थाओं की स्थापना तथा उद्यानों का निर्माण किया। १६७७ ई० में उन्होंने हरगोविन्दपुर की स्थापना की। उन्होंने गुरु नानक के सिद्धान्तों के प्रचार के लिए देश-भर का पर्यटन किया। 


पिरथीचन्द का पुत्र तथा हरगोविन्द का चाचा मेहरबान गुरु की समृद्धि को देख कर उनसे ईर्ष्या करने लगा और चन्द्र शाह से जा मिला। उन दोनों ने सम्राट् जहाँगीर के यहाँ जा कर गुरु पर यह अभियोग लगाया कि उन्होंने अपने पूर्वजों की परम्परा का परित्याग कर एक नियमित सेना का संघटन कर लिया है और इसके अतिरिक्त वह मुकदमे भी देखने लगे हैं। चन्दू शाह ने सम्राट् को दो लाख रुपयों के उस अर्थ-दण्ड की भी याद दिलायी जिसे गुरु के स्वर्गीय पिता अर्जुन सिंह को दिया गया था। उसने सम्राट् को उस अर्थ-दण्ड की वसूली का भी परामर्श दिया। उसने सम्राट् को यह सुझाव दिया कि जब तक उस अर्थ-दण्ड की वसूली नहीं हो जाती, तब तक उन्हें एक राजकीय बन्दी के रूप में लाहौर के किले में बन्द कर दिया जाये। सम्राट् ने इस सुझाव के प्रति अपनी सहमति प्रकट कर दी और गुरु हरगोविन्द को कारागार में डाल दिया गया।


हरगोविन्द को कारागार में बारह वर्ष व्यतीत करने पड़े। वहाँ गुरु ने अनेक हतभाग्य राजाओं तथा सामन्तों को दण्ड भोगते देखा। उनका एकमात्र अपराध यह था कि वे लोग उस राज्य-क्षेत्र के अधिपति थे जिस पर सम्राट् की लोलुप दृष्टि पड़ चुकी थी। हरगोविन्द अपने सहबन्दियों के लिए अत्यन्त उपयोगी थे। वह उनकी मुक्ति की योजना पर विचार करने लगे ।


उधर चन्दू शाह सोच रहा था कि वह कारागार में हरगोविन्द की हत्या सरलतापूर्वक कर सकता है। उसने किले के किलेदार हरिदास को हरगोविन्द की हत्या के लिए घूस देने का प्रयत्न किया। उसने गुरु के धारण करने के लिए उनके पास एक विषरंजित वस्त्र भेजा; किन्तु हरिदास गुरु का परम भक्त था। प्रख्यात फकीर मियां मीर ने चन्दू शाह के सारे दुष्कृत्यों से सम्राट् को अवगत करा कर हरगोविन्द की मुक्ति के लिए उनकी आज्ञा प्राप्त कर ली।


गुरु हरगोविन्द || सिखों के छठे गुरु


गुरु सम्राट् को धन्यवाद देने दिल्ली गये। सम्राट् ने गुरु के गले में पीत काष्ठ-निर्मित मनकों की एक सुन्दर माला देखी। उसने उस माला को अपने उपयोग के लिए लेना चाहा; किन्तु गुरु ने कहा- “मेरे पिता इस माला से भी सुन्दर माला पहना करते थे । उनकी उस माला के मनके मोती के थे; मेरी इच्छा है कि आप उसी माला को धारण करें ।” सम्राट् ने पूछा—“वह माला कहाँ है ? " गुरु ने बताया- "वह माला चन्दू शाह के पास है। उसने उसे उनके गले से चोरी से उतार लिया था।" सम्राट् ने चन्दू शाह को वह माला लाने का आदेश दिया। चन्दू शाह अपने घर गया, किन्तु वहाँ से वह खाली हाथ लौटा। उसने बहाना बनाया कि वह माला कहीं * गयी है। गुरु हरगोविन्द ने चन्द्र शाह के हाथों अपने पिता को दी गयी यन्त्रणाओं से गुम हो सम्राट् को अवगत कराया जिसके फल-स्वरूप चन्द्र शाह के विषय में सम्राट् का मत-परिवर्तन हो गया । उसके प्रति उनके मन में कटुता के भाव उत्पन्न हो गये । जन चन्द्र शाह सम्राट् के सम्मुख बिना माला के पहुँचा, तब उसने हरगोविन्द से उसे अपने साथ ले जा कर उनके पिता के भयावह तथा दुःखद अन्त के लिए प्रतिशोध लेने को कहा। हरगोविन्द ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा- "सच्चा, गुरु उदार तथा संवेदनशील होता है। उसकी करुणा क्षणिक नहीं होती। वह सर्वभूतों के कल्याण की कामना करता है। " चन्द्र शाह के घर की तलाशी लेने पर मोतियों की वह माला मिल गयी ।


गुरु हरगोविन्द के अनुयायी चन्दू शाह को अमृतसर ले गये। वहाँ उन्होंने उसे गुरु अर्जुन के प्रति किये गये उसके निर्मम व्यवहार के लिए उसे प्रायश्चित्त करने को विवश किया। उस पर कीचड़ तथा गन्दी वस्तुएँ डाली गयीं और उसे नीचकुलोत्पन्न व्यक्तियों के द्वारा चप्पलों से पिटवाया गया। उसे प्रतिदिन इधर-उधर भिक्षाटन के लिए विवश किया गया। एक भड़भूजे ने अपनी लोहे की कलछी से उसके कपाल पर सांघातिक प्रहार किया और भङ्गियों ने उसके शरीर को रावी नदी में फेंक दिया।


पिरथी के पुत्र मेहरबान तथा चन्दू शाह के पुत्र करमचन्द ने गुरु के विरुद्ध शाहजहाँ के कान भरे । गुरु गुमतला गाँव के निकट शिकार खेल रहे थे। उसी समय शाहजहाँ भी कुहला के निकट शिकार खेल रहा था। उसका एक श्वेत बाज गुरु के बाजों में जा मिला। सम्राट् के अनुचरों ने उस बाज को अपना बताया; किन्तु गुरु ने उसे लौटाना अस्वीकार कर दिया ।


इसके फल-स्वरूप शाहजहाँ अत्यन्त रुष्ट हो गया। उसने गुरु को पकड़ने तथा उनके अनुयायियों को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र सेना भेज दी। अमृतसर के निकट घनघोर युद्ध हुआ जिसमें शाहजहाँ की सेना को पराजित होना पड़ा। गुरु ने राजकीय सेना के विरुद्ध तीन लड़ाइयाँ जीतीं ।


दामोदरी, नानकी तथा मारवाही — गुरु की ये तीन पलियाँ थीं। गुरुदित्ता दामोदरी के; अनीराय, तेजबहादुर तथा अटल राय नानकी के और सूरजमल मारवाही के पुत्र थे


गुरु हरगोविन्द अब पहाड़ियों के निकट करतारपुर में रहने लगे जहाँ १६४५ ई० में उनका देहान्त हो गया। इसके पूर्व उन्होंने अपने पौत्र हर राय को अपने उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित कर दिया था। गुरु हरगोविन्द सैतिस वर्षों तक गुरु-गद्दी पर पदासीन रहे । उनका देहान्त अड़तालिस वर्ष की आयु में हुआ ।


गुरु हरगोविन्द एक महान् पुरुष, एक महान् जन-नायक तथा एक महान् पथ-प्रदर्शक थे । सिक्खों के हृदय में गुरु हरगोविन्द के प्रति आत्यन्तिक प्रेम तथा आदर के भाव थे। उनकी मृत्यु को एक राष्ट्रीय आपदा समझा गया। उनके अनेक अनुयायियों ने उनकी चिता पर जल कर स्वेच्छापूर्वक प्राण त्यागना चाहा। उनमें से एक जाट तथा एक राजपूत ने उनके चरणों पर अपने प्राण त्याग दिये।


हिन्दू तथा मुसलमान गुरु हरगोविन्द का समान भाव से आदर करते थे। उन्होंने हरगोविन्दपुर तथा अमृतसर के बीच मुसलमान यात्रियों के लिए सुविधाजनक स्थानों पर मस्जिदों तथा डेरों (Dehras) का निर्माण किया था। उनको वहाँ गुरु की ओर से भोजन दिया जाता था ।


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FAQ


कौन थे गुरु हरगोविन्द सिंह?

गुरु हरगोविन्द सिंह सिख धर्म के छठे गुरु थे और उनका जन्म 1575 ई. में हुआ था।

गुरु हरगोविन्द की शिक्षाएँ और योगदान क्या थे?

गुरु हरगोविन्द ने सिखों को सैन्य तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने सिखों की रक्षा के लिए सेना तैयार की और उन्हें शस्त्र सज्जित करने की शिक्षा दी।

गुरु हरगोविन्द का जन्मस्थान कहाँ था?

गुरु हरगोविन्द का जन्म अमृतसर के निकट बहाली गाँव में हुआ था।

गुरु हरगोविन्द के योद्धा और संत के रूप में योगदान क्या था?

गुरु हरगोविन्द ने अपने अनुयायियों को सैन्यतन्त्र में प्रशिक्षित किया और उन्हें योद्धा बनाया। वे एक प्रमुख संत भी थे जिन्होंने धार्मिक शिक्षा देने के साथ-साथ सामाजिक सुधार की दिशा में भी कई प्रयास किए।

गुरु हरगोविन्द की मृत्यु कब हुई और कैसे?

गुरु हरगोविन्द की मृत्यु 1645 ई. में हुई। उनकी मृत्यु के पूर्व, उनके अनुयायी ने उनके प्रति आदर दिखाने के लिए अपने प्राण त्यागे।

गुरु हरगोविन्द का यात्रा पर जाने का कारण क्या था?

गुरु हरगोविन्द ने यात्रा पर जाते समय अपने अनुयायियों की सुरक्षा और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा जातियों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर की थी।

गुरु हरगोविन्द के विचार और संदेश क्या थे?

गुरु हरगोविन्द के विचार और संदेश में समाज में समानता, धर्मिक सहिष्णुता, और अध्यात्मिकता के महत्व को जोर दिया गया था। उन्होंने लोगों को अपने धर्म के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा दी।

गुरु हरगोविन्द के विरुद्ध कौन-कौन से प्रयास किए गए थे?

गुरु हरगोविन्द के विरुद्ध कुछ शक्तियों और व्यक्तियों द्वारा प्रयास किए गए थे जो उनके सिखों के खिलाफ साजिश कर रहे थे।

गुरु हरगोविन्द के योद्धा और संत के रूप में योगदान का परिणाम क्या रहा?

गुरु हरगोविन्द के योद्धा और संत के रूप में योगदान का परिणाम यह था कि उनके द्वारा गठित सिख समुदाय ने सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया और समाज को समानता की दिशा में मार्गदर्शन किया।

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