वेदों में सौंदर्यवर्धक औषधियां
वेद भारतीय संस्कृति के मूल स्रोत हैं भारतीय संस्कृति का यथार्थ ज्ञान वेदों में और वैदिक वाङ्मय से ही प्राप्त होता है प्राचीन समय में वस्तुओं के नाम आदि तथा मानव के कर्तव्यों का निर्धारण वेदों में ही किया गया हैं ।
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥
वेदों में सभी प्रकार का ज्ञान है वेद चार – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन में से अथर्ववेद में सभी प्रकार का व्यावहारिक उपयोगिता में आने वाले औषधीयों का ज्ञान है ।
पेड़ पौधे और जड़ी बूटी का ज्ञान भी है यहां पर हम कुछ वेदों की जड़ी बूटी का अपने सौंदर्य पर असर होता है ।
क्योंकि आजकल बाजार में अनेक औषधि प्राप्त होती है परंतु यह तो शरीर को नुकसान देने वाली होती है आयुर्वेद और वेदों में बताया हुआ औषधि का मनुष्य को फायदा ही होगा यह तो मालूम होगा कि आयुर्वेद और वेद में बताए मार्ग से फायदा धीरे-धीरे होगा परंतु नुकसान नहीं होगा ।
प्रयोग भेद से ओषधियाँ चार प्रकार की मानी गयी हैं -
आथर्वणीराङ्गिरसीदैवी मनुष्यजा उत ।ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि । ।
आथर्वणी, आंगिरसि, दैवी और मनुष्यजा । शान्ति पौष्टिक कर्मो में उपयुक्त औषधियाँ आथर्वणी कहलाती थीं । उच्चाटन, मारण आदि घोर कृत्यों में प्रयुक्त ओषधि-याँ अंगिरसी थीं । देवों के समान अजर-अमर बनाने वाले रसायन आदि औषध प्रयोग देवी तथा सामान्यतः रोग निवारण के लिये प्रयुक्त मनुष्यजा कहलाती थीं ।
अथर्ववेद में भी अन्य वेदों की तरह सुखी, स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना यत्र-तत्र प्राप्त होती है । वर्तमान समय में भी मनुष्य दीर्घ जीवन चाहता है । चूँकि आधुनिक काल विकास काल है । प्रत्येक व्यक्ति सुंदर दिखने की अभिलाषा करता है । इसी अभिलाषा को पूर्ण करने के लिये वह नित्य-नवीन तथा प्राकृतिक सौंदर्यवर्थक ओषधियों को प्रयुक्त करने में अग्रणी रहता है । सौंदर्य के प्रति मनुष्य का यह आकर्षण वर्तमान काल में ही नहीं अपितु वैदिक काल से चला आ रहा है । वैदिक काल में भी नर-नारी सुंदर दिखने के लिये अनेक सौंदर्यवर्धक ओषधियाँ प्रयुक्त करते थे । अथर्ववेद में सौंदर्यवर्धक ओषधियों का उल्लेख मिलता है यह बात 'मां पश्यम्' से सिद्ध होती है ।
इंद खनामि भेषजं मां पश्यमभिरोरुदम् ।परायतो निवर्तनमायतः प्रतिनन्दनम ।।
अथर्ववेद में कई ओषधियों का उल्लेख मिलता है जो कि सौंदर्यवर्धक हैं । ये ओषधियाँ इस प्रकार से हैं-
केशवर्धनी
संस्कृत नाम- भृङ्गराज, भृङ्गरज, मार्कव, भृङ्ग, केशराज, केशरञ्जन ।
हिन्दी- भाङ्गरा, भङ्गरा, भंगरैया ।
अथर्ववेद में केशवर्धनी, देवी, देवती, नितत्नी का उल्लेख है । इन्हें केशवृंहणी भी कहा है । ये बालों को लम्बा करने वाली, घना करने वाली और केशस्वस्थकर ओषधियाँ हैं । केशवर्धनी तथा केशवृंहणी रेवती, देवी व नितत्नी नामक ओषधियों के विशेषण हैं । ये ओषधियाँ जहाँ बाल नहीं आते वहाँ बालों को लाती (उगाती) हैं । यह केशों को झड़ने से रोकने के लिये तथा अन्य केश रोगों की चिकित्सा के लिये प्रयुक्त की जाती है । यह त्वचा को साफ करने वाली तथा दाँतों के लिये हितकर है । बाल काला करने के लिये तथा बढ़ाने के लिये इसका रस काशीश के साथ लेप करते हैं ।
इसके अतिरिक्त यकृत वद्धि, प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श, उदर, शिरः शूल, त्वचा के रोग, चक्कर आदि में इससे लाभ होता है । छोटे बच्चों को खाँसी में दिया जाता है ।
खदिर
संस्कृत नाम- खदिर, रक्तसार, गायत्री, दन्तधावन, कण्टकी, बालपत्र, बहुशल्य, यज्ञिय
हिन्दी- खैर, कत्था
खैर के वृक्ष को खदिर कहते हैं । यह ओज तेज-वर्धक है । अथर्ववेद में
अश्वत्थात् खदिराद् धवात्........... । ।
इसका अनेकत्र उल्लेख है । कुष्ठ में इसको खिलाते है तथा इसे स्नानादि भी कराते हैं । मुख में छाले पड़ गये हों तब कत्थे को चूसने को देते हैं ।
गुग्गुल-
संस्कृत नाम- गुग्गुल, गुग्गुलु, देवधूप, जटायु, कौशिक, पुर,
हिन्दी- महिषाक्ष, पलङ्कष
गूगल को गुग्गुल कहा गया है । यह सुगन्धित द्रव्य है । यज्ञ हवन में व धूप देने में यह काम आता है । अथर्ववेद में “यं भेषजस्य गुग्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते”। इसका उल्लेख है ।
कुष्ठ में इससे साधारण स्वास्थ्य अच्छा होता है । सभी प्रकार के चर्मरोगों में गूगल लाभदायक माना जाता है । इससे कंडू कम होती है तथा त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है ।
तिल
संस्कृत नाम- तिल
हिन्दी- तिल, तील, तिली
अथर्ववेद में “तिलस्य तिल पिञ्ज्या” इसका उल्लेख है । केशवृंहण, केशजनन और केशवर्धन आदि अनेक गुण हैं जो इसके सेवन से प्राप्त होते हैं । तिल के प्रयोग से दाँत मजबूत रहते हैं । इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग अर्श, खांसी, मूचाश्मरी, व्रण में भी किया जाता है ।
दूर्वा
संस्कृत नाम- नीलदूर्वा, रुहा, अनन्ता भार्गवी, शतपर्विका, शष्प, सहस्रवीर्या, शतवल्ली ।
हिन्दी- हरीदूव, नीली, दूव, रामघास
सभी वेदों में इसका उल्लेख है । अथर्ववेद में अनेकत्र दूर्वा का वर्णन है । यह दूब है । यह कफ, पित्त, रूधिर विकार, विसर्प, तृषा, दाह और त्वचा रोगों को नष्ट करती है ।
त्वचा के रोगों में इसकी जड़ का काथ पिलाते हैं । सद्योव्रण तथा त्वचा के रोगों में इसकी पत्तियों का लेप उपयोगी है । नेत्राभिष्यंद में पत्र-कल्क का लेप करते हैं । इसके अतिरिक्त बस्तिशोथ, सुजाक, अतिसार, पैत्तिक-वमन, उदर, जलोदर, अत्यार्तव, गर्भपात, उन्माद, अपस्मार तथा रक्तमेह में इसका प्रयोग किया जाता है ।
नलद (नलदी)
संस्कृत नाम- उशीर, नलद, अमृणाल, सेव्य, समगन्धिक
हिन्दी- खस, वीरन, मूल, गांडर, बेना
अथर्ववेद में “गुग्गुलुः पीला नलदी....तत्परेतात्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन”।। गूगल एवं कुष्ठ ओषधियों के साथ नलद तथा नलदी का उल्लेख है ।
इसका लेप दाह, त्वचा के रोग तथा पसीने को रोकने वाला है । इसके अतिरिक्त इसका उपयोग फांट के रूप में पित्तज्वर, प्रसूति ज्वर, तृष्णा, दाह, रक्तपित्त, विष, वमन, कुष्ठ में किया जाता है ।
पर्ण (पलाश)
संस्कृत नाम- पलाश, किंशुक, पर्ण, यज्ञिय, रक्तपुष्पक, क्षारश्रेष्ठ, ब्रह्मवृक्ष, समिद्धर ।
हिन्दी- ढाक, पलाश, परास, टेसू
सभी वेदों में इसका वर्णन है । अथर्ववेद में समृद्धि और प्रियंकरण के लिये धारण की जाती है । और रक्त शोधक है ।
इसके फल और फूल कुष्ठ को दूर करने वाले हैं । बीजों को नींबू के रस के साथ घिसकर दाद आदि चर्म रोगों में लगाते हैं । इसके अतिरिक्त इसका उपयोग प्रमेह, अर्श, कृमि, वात, कफ, गुल्म तथा उदररोग में किया जाता है ।
पारिभद्र (फरहद)
संस्कृत नाम- पारिभद्र, निम्बतरू, मन्दार और पारिजातक,
हिन्दी- फरहद, पांगारा
इसकी छाल को पीसकर नेत्राभिष्यंद में पलकों पर लगाते हैं । इसकी छाल के अंदर के भाग पर घी लगाकर तथा उस पर घी के दिये का काजल जमाकर इसका नेत्र के विकारों में अञ्जन कराया जाता है । इसके अतिरिक्त रक्तयुक्त आँव, निन्द्रा, वाजीकरण, फिरंग, उपदंश, ज्वर, सनार्तव, मूत्रकच्छ, ‘कृमि, कर्णशूल व दंतशूल में भी प्रयोग में लाया जाता है ।
अश्वत्थ
संस्कृत नाम- बोधिद्रु, पिप्पल, अश्वत्थ, चलपत्र, गजाशन
हिन्दी- पीपल वृक्ष
अश्वत्थ पीपल के पेड़ को कहते हैं । सभी वेदों में इसका वर्णन है । अथर्ववेद में “अश्वत्थो देवसदनः”।। अश्वत्थ का प्रयोग शत्रुनाशन, रूपशोधन, योनिशोधन, रक्तशो—धन तथा कफ, पित्त, व्रणादि की चिकित्सा के लिये दर्शाया गया है ।
इसके पत्तों का लेप अथवा लाक्षा (गोंद) व्रणों, व्याइयों, घावों में लाभकारी है । यह वर्ण को उत्तम बनाने वाला तथा रक्तविकार को दूर करने वाला है । इसके अतिरिक्त इसका उपयोग वाजीकरण, हिक्का एवं वमन, सोजाक, गण्डूष आदि में किया जाता है ।
शतावर
संस्कृत नाम- शतावरी, बहुसुता, इन्दीवरी, नारायणी, शतपदी, शतवीर्या, महाशतावरी, शतमूली सहस्रवीर्या, महोदरी आदि ।
हिन्दी- सतावर, सतावरि, सतमूली, शतावर, सरनोई
अथर्ववेद में “शतावरी अनीनशद् यक्ष्मान् रक्षांसि तेजसा”।। इसकी मणि का विधान है । यह कुष्ठ और काण्डू के लिये हितकर कहा गया है । इससे सिद्ध तैलों का बाह्य प्रयोग शिरोरोग, चर्मरोग में करते है ।
इसके अतिरिक्त इसका उपयोग अन्य औषधों के साथ नपुंसकता, शुक्रमेह, शुक्रतारल्य, नेत्ररोग, अतिसार, ग्रहणी, मूत्रकच्छ, रक्तपित्त तथा अपस्मार में किया जाता है ।
शमी
संस्कृत नाम- शमी, शक्तुफला, तुङ्गा, केशहन्त्री, शिवाफला, मङ्गल्या, लक्ष्मी
हिन्दी- छोंकर, शमी, छिकुर
अथर्ववेद में “शमीमश्वत्थ आरुढ़ः”।। इसका उल्लेख है । यह सफेद कीकर है । यह कास, श्वास रोग, कुष्ठ, अर्श तथा कृमिनाशन है । इसे केशहन्त्री भी कहते हैं, क्योंकि इसके क्षार को हरताल के साथ प्रयोग करने पर बाल झड़ जाते हैं ।
इसकी फली केश को हानि पहुँचाने वाली होती है । बालों को हटाने के लिये इसकी राख मलते हैं । इसके अतिरिक्त इसकी छाल का उपयोग संग्राहक एवं रक्तपित्त में किया जाता है ।
इन ओषधियों के अतिरिक्त कुछ सौंदर्यवर्धक ओषधियां ये भी हैं जिनका यत्र-तत्र अथर्ववेद में उल्लेख मिलता है -
अभिरोरुद- अभिरोरुद को आसुरी ओषध कहा है । यह वशीकरण (पति को वश में करने के लिये) प्रयुक्त की जाती है । इसे वर्चस्य एवं प्रियंकरणी ओषध कहा गया है ।
अश्वावती- अथर्ववेद की पैप्पलाद संहिता में अश्वावती नामक औषध का वर्णन है । यह शोभावर्धक और शक्तिवर्धक रसायन है ।
असिक्नी- असिक्नी का अर्थ सायण ने नीली औषध किया है । यह श्वित्र, श्वेत कुष्ठ और शरीर पर पड़े धब्बों (दागों) की दवा है । अथर्ववेद में -
असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव ।असिक्नयस्योषधे निरितो नाशया पृषत् । । इसका उल्लेख है ।
आञ्जन- आञ्जन खनिज भी होता है और एक पेड़ भी है । यह त्रिककुद् पर्वत पर यमुना प्रदेश में होता है । अतैव इसे यामुन एवं त्रैककुद कहा जाता है । अथर्ववेद में इसे कामला, हृदय रोग, धातुरोग, तक्मा, अंगभेद तथा कफरोगों में और चक्षुरोगों में हितकर कहा है । पैप्पलाद शाखा में भी इसको नेत्रज्योतिवर्धक, रक्षोनाशक, दुःस्वप्ननाशक और क्षेत्रिय रोग शामक बताया है । अथर्ववेद में-
एहि जीवं त्रायमाणं पर्वस्यास्यक्ष्यम ।विश्वभिर्देवैर्दत्तं परिधिर्जीवनाय कम् । ।
आञ्जन के अनेक उल्लेख प्राप्त होते हैं । यह आँखों के लिये अत्यन्त लाभदायक है ।
ऋतावरी/ऋतजात- ये मधुला औषधि के विशेषण के रूप में वर्णित हैं । ये विष नाशक एवं माधुप्रदायक कही गई हैं ।
शतं च मे सहसंचापवक्तार ओषधे ।
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः।।
इसे केशों (बालों) को स्वस्थ रखने वाली कहा गया है ।
तलाश/तलाशा- सम्भवतः यह तालीश (तालीस पत्र) वृक्ष है । अथर्ववेद में तलाशा को अपने, पराये लोगों के द्वारा किये अभिचारों से मणिबंधन के रूप में बचाने वाली और शरीर को स्वस्थ तथा सुन्दर बनाने वाली औषध माना है ।
पूतुदु- पूतुडु का उल्लेख अथर्ववेद में 'पूतुदूर्नाम भेषजम्' मिलता है । यह मूत्ररोगों, ज्वर, अश्मरी, सूजाक, गठिया आदि रोगों में सेवनीय माना जाता है । इसका क्वाथ, तेल एवं चूर्ण आदि का प्रयोग चर्मरोगों, व्रणों तथा कुष्ठ में हितकर है ।
पुष्पा- अथर्ववेद के मंत्र में 'पुष्पा मधुमतीम्’ में पुष्पा ओषधि का वर्णन है । यह कुष्ठरोगों में हितकर है ।
बिस- अथर्ववेद मे ‘कुमुदं बिसम्’ इसका उल्लेख है । यह पद्मकन्द है । यह दाह, तृषा नाशक, दुग्धवर्धक तथा रक्तशोधक हैं ।
रजनी- अथर्ववेद के मंत्र में 'इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत्' रजनी को किलास रोग (श्वेत कुष्ठ), पलित (बालों का अकाल श्वेत होना) आदि रोगों की औषध कहा गया है ।
रामा- सायण ने रामा का अर्थ भृंगराज किया है । “अथर्ववेद में नक्तं जातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्निच" इसका उल्लेख है । यह श्वित्र एवं पलित की दवा बतायी गयी है ।
श्यामा- अथर्ववेद में “श्यामा सरूपंकरणी” इसका इसका उल्लेख है । यह श्वेत कुष्ठ (श्वित्र) और पलित की उत्तम ओषधि हैं । कतिपय विद्धान ‘श्यामा’ को तुलसी मानते हैं । श्वेत धब्बों (शरीर के) अथवा बालों की श्वेतिमा को दूर करने के कारण ही यह सरूपंकरणी कही गयी है ।
इस प्रकार इन सभी ओषधियों को किसी ने किसी रूप में मनुष्य सौंदर्य सामग्री में प्रयुक्त करता था और अपना सौंदर्यवर्धन करता था । अथर्ववेद की ये औषधियाँ सौंदर्य विज्ञान को एक अनुपम देन है । मनुष्य ही एक ऐसा चतुर प्राणी है जो काल और दिक् के परिवर्तनशील वातावरण के अनुरूप अपने को बनाना जानता है । उसकी इस प्रतिभा ने विश्व में उसे सर्वोच्च पद प्रदान किया है तथा उसे इस योग्य बनाया है कि वह प्रगति कर सके । यह ज्ञात ही है कि सृष्टि के प्रारम्भ काल से व्याधियों के निराकरण के लिये वानस्पतिक औषधियों का प्रयोग किया जाता रहा है ।
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