शिव महिम्न स्तोत्रम् | हिन्दी अर्थ सहित

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|। श्रीगणेशाय नमः ।|

|| शिवमहिम्नस्तोत्रम् ||


🕉मंगलाचरण🌼🙏

वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुम वन्दे जगत कारणम्
वन्दे पन्नग भूषणं मृगधरं वन्दे पशूनाम पतिं ।
वन्दे सूर्य शशांक वहनि नयनं वन्दे मुकुन्दप्रियम्
वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शंकरम ॥

॥ अथ शिवमहिम्नः स्तोत्रं ॥
पुष्पदंत उवाच

महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी।
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः॥
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन्।
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥1॥


अर्थ:- हे हर ! (सभी दुःखों के हरनेवाले) आपकी महिमा के अन्त को जाननेवाले मुझ अज्ञानी से की गई स्तुति यदि आपकी महिमा के अनुकूल न हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि ब्रह्मा आदि भी आपकी महिमा के अन्त को नहीं जानते हैं। अतः उनकी स्तुति भी आपके योग्य नहीं है। "स वाग् यथा तस्य गुणान् गृणीते' के अनुसार यथामति मेरी स्तुति उचित ही है। क्योंकि "पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः" इस न्याय से मेरी स्तुति आरम्भ करना क्षम्य हो ।॥ १ ॥


अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो:।
रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः।
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥2॥


अर्थ:हे हर ! आपकी निर्गुण और सगुण महिमा मन और वाणी के विषय से परे है, जिसे वेद भी संकुचित होकर कहते हैं। अतः आपकी उस महिमा की स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है। तब भी अर्वाचीन (भक्तों के अनुग्रहार्थ धारण किया हुआ नवीन) रूप भक्तों के मन और वाणी का विषय हो सकता है ॥ २॥


मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत:।

स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम्।।
मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः।
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥3॥


अर्थ:-हे ब्रह्मन् ! जब कि आपने मधु के सदृश और अमृत के सदृश जीवनदायिनी वेदरूपी वाणी को प्रकाशित किया है, तब ब्रह्मादि से की गई स्तुति आपको कैसे प्रसन्न कर *सकती है? हे त्रिपुरमथन ! जब ब्रह्मादि भी आपकी स्तुति-गान करने में समर्थ नहीं हैं, तब मुझ तुच्छ की क्या सामर्थ्य है। मैं तो केवल आपके गुण-गान से अपनी वाणी को पवित्र करने की इच्छा करता हूँ ॥ ३॥


तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत्।
त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥
अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम्।
विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥4॥


अर्थ:हे वरद ! (वर देनेवाले) आपके ऐसे ऐश्वर्य का जो संसार की सृष्टि, रक्षा तथा प्रलय करनेवाला है, तीनों वेदों से गाया हुआ है, तीनों गुणों (सत्, रज, तम) से परे है, तीनों शक्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में व्याप्त है, कुछ नास्तिक अनुचित निन्दा करते हैं। इससे उन्हीं का अधःपतन होता है न कि * आपके यश का ॥४॥


किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम्।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च॥
अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः।
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥5॥


अर्थ:- "अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्" के अनुसार कल्पना से बाहर, अपनी अलौकिक माया से सृष्टि करनेवाले आपके ऐश्वर्यके विषय में नास्तिकों का यह विचार ( वह ब्रह्म सृष्टिकर्ता है, किन्तु उसकी इच्छा, शरीर सहकारी कारण आधार और समवायि कारण क्या है ? ) कुतर्क जगत के कतिपय मन्द-मति वालोंको भ्रान्ति के लिए वाचाल करता है ॥ ५ ॥


अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां।
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो।
यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥6॥


अर्थ:-हे अमरवर ! (देवश्रेष्ठ) यह सावयव लोक अवश्य ही जन्य है तथा इसका कर्ता भी कोई-न-कोई है, परन्तु वह कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना की सामग्री ही दूसरे के पास असम्भव है। इसलिये अज्ञानी लोग ही तुम्हारे विषय में संदेह करते हैं ।। ६ ।।


त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति।
प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च॥
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां।
नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥7॥


अर्थ:- हे अमरवर ! वेदत्रयी, सांख्य, योग, शैव मत और वैष्णव मत ऐसे भिन्न-भिन्न मतों में कोई वैष्णव मत और कोई शैवमत अच्छा कहते हैं, रुचि की विचित्रता से टेढ़े-सीधे मार्ग में प्रवृत्त हुए मनुष्यों को अन्त में एक आप ही साक्षात् या परम्परया प्राप्त होते हो, जैसे नदियाँ टेढ़ी-मेढ़ी बहती हुई साक्षात् या परम्परा से समुद्र में ही मिलती हैं ।।७।।


महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः।
कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्॥
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्द्ध प्रणिहिताम्।
न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति।। 8।।


अर्थ:हे वरद ! महोक्ष (बैल), खटिया का पाया, परशु, गजचर्म, भस्म, सर्प, कपाल इत्यादि आपकी धारण सामग्रियाँ हैं, परन्तु उन ऋद्धियों को जो आपकी कृपा से प्राप्त देवता लोग भोगते हैं, आप क्यों नहीं भोगते?  स्वात्माराम (आत्मज्ञानी) को विषय (रूप-रसादि) रूपी मृगतृष्णा नहीं भ्रमा  सकती हैं ॥८॥


ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम्।
परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये॥
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव।
स्तुवज्ञ्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।।9।।


अर्थ:- हे पुरमथन ! सांख्य मतानुयायी 'नह्यसत उत्पत्तिः सम्भवति' के अनुसार जगत् का ध्रुव (नित्य), बुद्धिमतानुयायी अध्रुव (क्षणिक), तार्किक जन नित्य (आकाश आदि पश्च और पृथिव्यादि परमाणु और अनित्य कार्यद्रव्य) दोनों मानते हैं। इन मतान्तरों से विस्मित मैं भी आपकी स्तुति करता हुआ लज्जित नहीं होता, क्योंकि वाचालता लज्जा को स्थान नहीं देती ॥९॥


तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः।
परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः॥
ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्।
स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।।10।।


अर्थ:हे गिरीश ! (गिरि में शयन करनेवाले), आपकी तेजपुञ्ज विभूति को ढूँढ़ने के  लिए ब्रह्मा आकाश तक और विष्णु पाताल तक जाकर भी उसे पाने में असमर्थ रहे, तत्पश्चात् उनकी कायिक, मानसिक और वाचिक सेवा से प्रसन्न होकर आप स्वयं प्रकट हुए, इससे यह निश्चय है कि आपकी सेवा से ही सब सुलभ है॥१०॥ 


अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम्।
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्॥
शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः।
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम् ॥11॥


अर्थ:हे त्रिपुरहर ! मस्तकरूपी कमल की माला  को जिस रावण ने आपके कमलवत् चरणों में अर्पण करके त्रिभुवन को निष्कण्टक बनाया था तथा युद्ध के लिए सर्वदा उत्सुक रहनेवाली भुजाओं को पाया था, वह आपकी अविरल भक्ति का ही परिणाम था ॥११॥


अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम्।
बलाकैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः॥
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगु ष्ठशिरसि।
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः।।12।।


अर्थ:रावण द्वारा उन्हीं भुजाओं से जिन्होंने आपकी सेवा से बल प्राप्त किया था, आपके घर कैलास को उखाड़ने के लिए हटात् प्रयोग करते ही आपके अँगूठे के अग्र भाग के संकेत मात्र पाताल में गिरा, निश्चय ही खल उपकार भूल जाते हैं ।। १२ ।।


यदृद्धि सुत्राम्णो वरद! परमोच्चैरपि सती।
मधश्चक्र बाणः परिजनविधैयस्त्रिभुवनः॥
नतच्चित्रं तस्मिन्वरिवसिरित्वच्चरणयोः।
न कस्याप्युन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥13॥


अर्थ:हे शम्भो ! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनों लोकों पर राज किया। हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धा भक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है।।


अकाण्ड: ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा।
विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संह तवतः ।।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो।
विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभगंव्यसनिनः ॥14॥


अर्थ:हे त्रिनयन ! सिन्धु विमंथन से उत्पन्न कालकूट से असमय में ब्रह्माण्ड के नाश से डरे हुए सुर व असुरों पर कृपा करके एवं संसार को बचाने की इच्छा से उसको (काल कूट को) पान करने से आपके कण्ठ की कालिमा भी शोभा देती है। ठीक ही है, जगत् के उपकार की कामना वाले दूषण भूषण समझे जाते हैं ।॥ १४ ॥


असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे।
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्।
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।। 15।।


अर्थ:जो विजयी कामदेव अपने बाणों द्वारा जगत् के देव, मनुष्य और राक्षसों को जीतने में सर्वथा समर्थ रहा, उसी कामदेव अन्य देवों के समान आपको भी समझा, जिससे वह स्मरण मात्र के लिये ही रह गया (दग्ध हो गया), जितेन्द्रियों का अनादर करना अहितकारक ही होता है ।। १५ ।।


मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम्।
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्॥
मुहुर्योदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा।
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥ 16॥


अर्थ:हे ईण ! आप जगत् की रक्षा के लिए राक्षसों को मोहित करके नाश के लिए नृत्य करते हो, तब भी संसार का आपके ताण्डव से दुःख दूर होता है, क्योंकि आपके चरणों के आघात से पृथ्वी धँसने लगती है. विशाल बाहुओं के संघर्ष से नक्षत्र आकाश पीड़ित हो जाता है तथा आपकी चंचल जटाओं से ताड़ित हुआ स्वर्ग लोक भी कम्पाय- मान हो जाता है। ठीक ही है, उपकार भी किसी के लिए अहितकारक हो जाता है ॥ १६ ॥


वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते॥
जगद्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति।
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः।।17।।


अर्थ:हे ईश ! तारा गणों की कान्ति से अत्यन्त शोभायमान आकाश में व्याप्त तथा भूलोक को चारों ओर से घेरकर जम्बू द्वीप बनाने वाली गङ्गा का जल-प्रवाह आपके जटाकपाट में बूंद से भी लघु देखा जाता है। इतने से ही आपके दिव्य तथा श्रोष्ठ शरीर की कल्पना की जा सकती है ।। १७ ।।


रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा।
रथांगेचन्द्राकौं रथचरणपाणिः शर इति॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः।
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः।।18।।


अर्थ:हे ईश ! तृण के समान त्रिपुर को जलाने के लिए पृथ्वी को रथ, ब्रहमा को सारथी, हिमालय को धनुष, सूर्य-चन्द्र को रथ का चक्र तथा विष्णु को विषघर बाण बनाना आपका आडम्बर मात्र है। विचित्र वस्तुओं से क्रीडा करते हुए समथों की बुद्धि स्वतन्त्र होती है ।। १८ ।।


हरिस्ते साहस्त्र कमलबलिमाधाय पदयो।
र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहर कमलम्।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा।।
त्रयाणां रक्षायं त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥19॥


अर्थ:हे त्रिपुरहर ! विष्णु आपके चरणों में प्रति दिन सहस्र कमलों का उपहार देते थे। एक दिन एक की कमी होने के कारण उन्होंने अपने एक कमलवत् नेत्र को निकाल कर पूरा किया। यह भक्ति की चरम सीमा चक्र के रूप में आज भी संसार की रक्षा किया करती है ।। १९ ।।


क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् ।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् ।
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥20॥


अर्थ: -हे त्रिपुरहर ! आप ही को यज्ञ के फल का दाता समझ कर, वेद में दृढ़ विश्वास कर मनुष्य कर्मों का आरम्भ करते हैं। क्रिया रूप यज्ञ के समाप्त होने पर आपही फल देने वाले रहते हैं। आपकी आराधना के बिना नष्ट कर्म फलदायक नहीं होता ।। २० ।।


क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां।
सृवीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः।।
क्रतुन षस्त्वत्तः क्रतुफल विधानव्यसनिनो।
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः॥ 21॥


अर्थ:- हे शरणद ! कर्मकुशल यज्ञपति दक्ष के यज्ञ के ऋषिगण ऋत्विज, देवता सदस्य थे । फिर भी यज्ञ के फल देने वाले आप को अप्रसन्नता से वह ध्वंस हो गया। निश्चय है कि आप में श्रद्धा-रहित किया गया यज्ञ नाश के लिए ही होता है ।। २१ ।।


प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्त्वां दुहितरम्।
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।।
धनुः पाणेर्यातं दिवमपि सपत्नाकृतममुम्।
त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥22॥


अर्थ:हे नाथ! काल से प्रेरित मृगरूप धारण किये ब्रह्या को भय से मृगीरूपी धारण करने वाली अपनी कन्या में आसक्त देख, आपका उनके पीछे छोड़ा गया बाण आर्द्रा आज भी नक्षत्र रूप में मृर्गाशरा (ब्रह्मा) के पीछे वर्तमान है ।। २२ ।।


स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह वाय तृणवत्।
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वापुरमथन पुष्पायुधमपि॥
यदिस्त्रैणं देवो यमनिरतदेहार्ध-घटनाद्।
अवैति त्वामद्धावत वरद मुग्धा युवतयः॥23॥


अर्थ:हे यम-नियम वाले त्रिपुरहर ! आपकी कृपा से आपका अर्धस्थान प्राप्त करने वाली, अपने सौन्दर्य रूपी धनुष को धारण करने वाले कामदेव को जला हुआ देखकर भी यदि पार्वती आपको अपने अधीन समझें तो ठीक ही है, क्योंकि प्रायः युवतियाँ ज्ञान-हीन होतो हैं ।। २३ ।।


श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः।
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु ना मैवमखिलम्।
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि।। 24।।


अर्थ:हे स्मरहर ! आपका स्मशान में क्रीडा करना, भूत-प्रेत पिणा- चादि को साथ रखना, शरीर में चिता-भस्म का लेपन करना तथा नर मुंण्डों की माला पहिनना आदि वीभत्स कमों से यद्यपि आपका चरित अमगल मय लगता है, तथापि स्मरण करने वालों को हे चरद ! आप परम मंगलरूप हैं ।। २४ ।।


मनः प्रत्यविचत्त सविधमवधायात्तमरुतः।
प्रहष्यद्रोमाणः प्रमदसलिल्लोत्संगितदृशः।।
यदालोक्याह लावं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये।
यधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥25॥


अर्थ:हे वरद ! जिस प्रकार अमृतमय सरोवर में अवगाहन से (स्नान करने से, प्राणिमात्र तापत्रय से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों से पृथक् करके मन का स्थिर कर, विधि पूर्वक प्राणायाम से, पुलकित तथा आनन्दाश्र से युक्त योगीजन ज्ञानदृष्टि से जिसे देखकर परमा- नन्द का अनुभव करते हैं वह आपही हैं ।। २५ ।।


त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वंहुतवह।
स्त्वमापरत्वं व्योमत्वमुधरणिरात्मा त्वमिति च ॥
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता ब्रिभ्रतिगिरम्।
न विद्मस्तत्तत्वंवयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥26॥


अर्थ:- हे वरद, आपके विषय में ज्ञानीजनों की यह धारणा है "क्षिति हुत वह क्षेत्रज्ञाम्भः प्रभंजन चन्द्रमस्तपनवियदित्यष्टो मूतिर्नमोभव-विभ्रते ।" इस श्रुति के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा, बायु, अग्नि, जल. आकाश, पृथ्वी और आत्मा भी आपही हैं, किन्तु मेरे विचार से ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ आप न हों ।। २६ ।।


त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रि भुवनमथोत्रीनपिसुरां।
नकाराद्यं र्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः।।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः।
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥27॥


अर्थ:हे शरणद ! व्यस्त [अ, उ. म. ] 'ॐ' पद, शक्ति द्वारा तीन वेद [ऋग्, यजुः और साम], तीन वृत्ति [जाग्रत्, स्वप्न, सुप्ति), त्रिभुवन [भूर्भुवः स्वः] तथा तीनों देव [ब्रह्मा, विष्णु, महश], इन प्र५ञ्च। स व्यस्त आपका बोधक है और समस्त 'ॐ' पद, समुदाय शक्ति से सर्व विकार रहित अवस्थाश्रयसे विलक्षण अखण्ड, चैतन्य आपको सूक्ष्म ध्वनि से व्यस्त करता है ।। २७ ।।


भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां स्तथा।
भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ॥
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देवः श्रुतिरपि।
प्रियायास्मैधाम्नेप्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥28॥


अर्थ:हे देव ! भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान- यह जो आपके नाम का अष्टक है, इस प्रत्येक नाम में वेद और देवतागण [ब्रह्मा] आदि विहार करते हैं, इसलिये ऐसे प्रियधाम [आश्रय भूत] आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ।। २८ ।।


नमोनेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः॥
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो।
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥29॥


अर्थ:हे प्रियदव ! [निर्जन वन-विहरण शील], नेदिष्ठ [अत्यन्त समीप] दविष्ठ [अत्यन्त दूर [, क्षोदिष्ठ [अति सूक्ष्म], महिष्ठ [महान्], वषिष्ठ [अत्यन्त वृद्ध, यविष्ठ [अतियुवा], सव-त्वरूप और अनिर्वचनीय आपको नमस्कार है ।। २९ ।।


बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः ।
प्रबलतम से तत्संहारे हराय नमो नमः ॥
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौमृडाय नमो नमः ।
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥30॥


अर्थ:हे शिवजी ! जगत् की उत्पत्ति के लिये परम रजोगुण धारण किये भव [ब्रह्मा] रूप आपको बार-बार नमस्कार है और उस जगत् के सहार करने में तमोगुण को धारण करने वाले हर [रुद्र], आपके लिए पुनः पुनः नमस्कार है, जगत् के सुख के लिए सत्त्व गुण का धारण करने वाले मृड (विष्णु), आपको बार-बार नमस्कार है। तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे जो अनिर्वचनीय पद से विशिष्ट हैं, ऐसे आपको बार-बार नमस्कार है ।। ३० ।।


कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्वं क्व चेदम् ।
क्व च तव गुणसीमोल्लङ् घिनीशश्ववृद्धिः।।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्।
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥31॥


अर्थ:धारण करने वाले मृड (विष्णु), आपको बार-बार नमस्कार है। तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे जो अनिर्वचनीय पद से विशिष्ट हैं, ऐसे आपको बार-बार नमस्कार है ।। ३० ।।


असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे ।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥32॥


अर्थ:हे ईश ! असित अर्थात् काले पर्वत के समान कज्जल (स्याही) समुद्र के पात्र में हो, सुरवर (कल्पवृक्ष) के शाखा की उत्तम लेखनी हो और पृथ्वी कागज हो, इन साधनों को लेकर स्वयं शारदा यदि सर्वदा ही लिखती रहें तथापि वे आपके गुणों का पार नहीं पा सकतीं, तो मैं कौन है ॥ ३२ ॥


असुरसुरमुनीन्द्रं रचितस्येन्दुमौले।
ग्रंथित गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो।।
रुचिरमलघुवृत्तेः स्तोत्रमेतच्चकार ॥33॥


अर्थ:असुर, सुर और मुनियों से पूजित तथा विख्यात महिमा वाले ऐसे ईश्वर चन्द्रमौलि के इस स्तोत्र को अलघुवृत्त अर्थात् बड़े [शिख- रिणी] वृत्त में सकल गुण श्रेष्ठ पुष्पदंत नामक गन्धर्वं ने बनाया ।। ३३ ।।


अहरहरनवद्य धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्।
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्य:।।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र।
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥34॥


अर्थ:शुद्धचित्त होकर अनवद्य महादेवजी के इस स्तोत्र को जो पुरुष प्रतिदिन परम भक्ति से पढ़ता है, वह इस लोक में धन-धान्य, आयु से युक्त, पुत्रवान् और कीतिमान होता है और अन्त में शिव-लोक में जाकर शिवस्वरूप हो जाता है ।। ३४ ।।


महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥35॥


अर्थ:महादेवजी से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, महिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं, अघोर मन्त्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं और गुरु से श्रेष्ठ कोई तत्त्व (पदार्थ)  नहीं।॥ ३५ 


दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 36॥


अर्थ:दीक्षा, दान, तप, तीर्थादि तथा ज्ञान और यागादि क्रियाएँ इस शिवमहिम्नस्तोत्र के पाठ की सोलहवीं कला को भी नहीं प्राप्त कर सकती हैं ।। ३६ ।।


कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः।
शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः।।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्।
स्तवनमिदमकार्षीवृदिव्यदिव्यं महिम्नः ॥37॥


अर्थ:सभी गंधों के राजा पुष्पदंत भाल में चन्द्रमा को धारण करते वाले देवाधि देव महादेवजी के दास थे, वे सुरगुरु महादेवजी के क्रोध से अपनी महिमा से भ्रष्ट हुए, तव उन्होंने शिवजी की प्रसन्नता के लिए इस परम दिव्य शिवमहिम्न स्तोत्र को बनाया ।। ३७ ।।


सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम्।
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेतः।।
ग्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः।
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥38॥


अर्थ:यह पुष्पदंत का बनाया हुआ अमोघ स्तोत्र श्रेष्ठ देवताओं तथा मुनियों से पूज्य और स्वर्ग तथा मोक्ष का कारण है। इसे जो मनुष्य अनन्य चित्त से हाथ जोड़कर पढ़ता है, वह किन्नरों द्वारा स्तुत्य होकर शिवजी के समीप जाता है ।। ३८ ।।


आसमाप्त मिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्।
अनौपम्यं मनोहारि सर्व मीश्वर वर्णनम् ॥39॥


अर्थ:श्रीपुष्पदंत के मुख से निकले हुए इस पापहारो तथा महादेवजी के प्रिय स्तोत्र को सावधानी से कण्ठस्थ करके पाठ करने से प्राणी मात्र के स्वामी श्रीमहादेवजी प्रसन्न होते हैं ।। ३६ ।।


इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥40॥


अर्थ:अनुपम और मन को हरने वाला यह ईश्वर वर्णनात्मक, एवं पुष्पदंत गंधर्व का कहा हुआ स्तोत्र अब समाप्त हुआ ।। ४० ।।


तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥41॥


अर्थ:हे महेश्वर ! मैं नहीं जानता कि आप कैसे हैं? आप चाहे जैसे हों, आपके लिये मेरा नमस्कार है ।। ४१ ।।


एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥42॥


अर्थ:हे प्रभु ! प्रातःकाल या दोपहर या सायंकाल में या तीनों काल में जो आपकी महिमा का गान करेगा, वह सब पापों से छूटकर आपके लोक में सुख पूर्वक निवास करेगा ।। ४२ ।।


श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन।
स्तोत्रेण किल्विष-हरेण हर-प्रियेण ।।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन।
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥43॥


अर्थ:- इस प्रकार इस वाङ् मयी पूजा को मैं श्रीशङ्करजी के चरणों में अर्पण करता है, जिससे श्रीमहादेवजी मुझपर प्रसन्न रहें ।। ४३ ।।


।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम् ।।


भगवान शिव को शिवमहिम्न स्तोत्र अत्यंत प्रिय है, जिसके पाठ से साधक धन, वैभव, और यश की प्राप्ति करते हैं, और मृत्यु के बाद शिवलोक को प्राप्त होते हैं। इस स्तोत्र के पाठ का अत्यधिक महत्व बताया गया है। 


विशेष रूप से, उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध संत श्री रामकृष्ण ने इसका पाठ करते समय समाधि को प्राप्त किया था। इस स्तोत्र में कुल 43 श्लोक हैं, जो शिव की महिमा को व्यक्त करते हैं।


शिव महिम्न स्तोत्रम् pdf

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FAQ

शिवमहिम्न स्तोत्र क्या है?

शिवमहिम्न स्तोत्र भगवान शिव की महिमा और गुणों को व्यक्त करने वाला एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोकसंग्रह है।

शिवमहिम्न स्तोत्र का महत्व क्या है?

शिवमहिम्न स्तोत्र के पाठ से धन, वैभव, और यश की प्राप्ति होती है, और अन्त में साधक शिवलोक को प्राप्त होता है।

शिवमहिम्न स्तोत्र मे कितने श्लोक हैं ?

शिवमहिम्न स्तोत्र में कुल 43 श्लोक हैं, जो भगवान शिव की महिमा को व्यक्त करते हैं।

शिवमहिम्न स्तोत्र किसने रचा था?

श्रीपुष्पदन्तविरचितं शिवमहिम्नस्तोत्रं

शिवमहिम्न स्तोत्र के पाठ से किसी को किसी प्रकार का फायदा होता है?

हां, शिवमहिम्न स्तोत्र के पाठ से शिव भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक लाभ होता है, और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्राप्त होता है।

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