नवदुर्गा माता विशिष्ट ज्ञान गूढ ज्ञान

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देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥🙏

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          आज के लेख में हम लोग मां दुर्गा जी के जो 9 अवतार हैं, जिनकी हम 9 दिन उपासना करते हैं, उनके पीछे के विशिष्ट ज्ञान को समझेंगे और जानने  की कोशिश करेंगे की मां के 9 अवतारों से हमारे मानव जीवन के विषय में क्या गूढ ज्ञान जानने को मिलता है  । दोस्तों शाक्त संप्रदाय में मां दुर्गा को ब्रह्म के निराकार रूप का सगुण स्वरूप माना जाता है । और  ये दुनिया में शायद इकलौता ऐसा संप्रदाय है जहां पर ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पीछे की जो शक्ति  है उसको स्त्री रूप में देखा जाता है । दुर्गा जी की उपासना का इतिहास तो बहुत प्राचीन है  । ना केवल पुराणों में, आगम ग्रन्थों में, इतिहास ग्रन्थों में जैसे की रामायण और महाभारत  में मां दुर्गा का उल्लेख मिलता है, वहीं ऋग्वेद,अथर्ववेद, ताइत्तिरीय आरण्यक और देवी उपनिषद में  भी उनका उल्लेख मिलता है ।


तो दोस्तों उसके ऊपर  एक अलग से लेख लिखा जा सकती है।

लेकिन आज के लेख में उनके 9 अवतारों के  पीछे का जो रहस्य है, उसको जान लेते हैं । 


दोस्तों सनातन धर्म में जब अवतारों की बात होती है  तो जहां एक तरफ विष्णु जी के दशावतार प्रसिद्ध है,  

वहीं दूसरी तरफ मां दुर्गा के 9 अवतार और जहां  विष्णु जी के दशावतार पूरी मानवता के इवोल्यूशन को दर्शाते हैं, जैसे उनका प्रथम अवतार मत्स्य रूप  यह दिखता है की कैसे समुद्र से जीवन की उत्पत्ति हुई । उसके बाद उनका कुर्म अवतार की कैसे समुद्र  से थल पर जीवन आया, फिर वराह अवतार की कैसे जंगली जानवर बने, फिर नरसिंह अवतार की जानवर से मनुष्य  की उत्पत्ति हुई और उसके बाद आने वाले अवतार जैसे की परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्की, ये अवतार ऐसा दिखाते हैं की कैसे बौद्धिक क्षमता जो थी इंसान की, वो धीरे-धीरे बढ़ती गई और साथ में ही कैसे  उनकी आकांक्षा बढ़ती गई, तो जहां पर विष्णु जी का अवतार हमें पूरी मानवता के बारे में बताता  है, वहीं पर जो दुर्गा जी के 9 अवतार हैं वो particular एक व्यक्ति के मतलब individual आदमी के,  individual औरत के जो जीवन के अलग-अलग पड़ाव हैं,उनको समझाते हैं,



                          तो आइए एक-एक करके मां दुर्गा  के हर एक अवतार के पीछे की गहराई को समझते हैं ।



प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।

विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥



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शैलपुत्री:-

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दोस्तों दुर्गा जी का प्रथम अवतार शैलपुत्री  है और अगर आप नाम पर ध्यान दें तो इसमें दो चीज देखने को मिलती है: एक शैल और दूसरा पुत्री  । शैल का मतलब होता है पर्वत और पुत्री का मतलब आपको पता है daughter, तो शैलपुत्री का मतलब हो  जाता है की दी डॉटर ऑफ डी माउंटेन मतलब पर्वत की पुत्री और ये जो रूप है मां का ये सबसे प्रिमिटिव  रूप है, मतलब अभी वो पैदा हुई है और अगर इस अवतार की तुलना की जाए तो हम इस अवतार की तुलना एक नवजात शिशु से कर सकते हैं जो तुरंत पैदा हुआ होता है और जब शिशु पैदा होता है तो अपने नाम से नहीं जाना जाता है, मां-बाप के नाम से जाना जाता है । इस अवतार का, मां के इस अवतार का स्वयं का नाम नहीं है  । वो अपने पिता के नाम से जानी जा रही हैं:  शैलपुत्री । 

                    ऐसे ही बच्चे भी अपने पिता या मां के  नाम से जान जाते हैं और अगर आप स्वरूप को देखें तो मां के केवल दो हाथ दिखाएं गए हैं और यूजुअली  क्या होता है की मां दुर्गा जी के चार हाथ या आठ   हाथ [अष्टभुजा] या फिर 18 भुजाएं दिखाई जाती हैं ।  उनका विकराल रूप होता है लेकिन ये उनकी जो फॉर्म है  यह सबसे आधारभूत स्वरूप है, अभी बस पैदा हुआ है ।  तो इसीलिए इनके दो हाथ दिखाएं गए हैं, एक हाथ में है त्रिशूल और एक हाथ में है कमल । तो त्रिशूल जो  है वो विध्वंस प्रतीक है, असुर मर्दन का प्रतीक है,  

वहीं कमल जो है वह सौम्यता का प्रतीक है तो जैसे  बच्चे में कई ढेर सारे पोटेंशियल होते हैं की बड़ा   होकर क्या-क्या करेगा, एक नवजात शिशु में । वैसे ही  मां दुर्गा में भी बहुत पोटेंशियल है की जहां एक तरफ  वो असुरों का मर्दन कर सकती हैं, त्रिशूल उठा सकती  हैं, weapon उठा सकती हैं, वहीं दूसरी तरफ जो कमल है वो इस बात को दिखता है की मां शांति, आनंद, और  धर्म की स्थापना भी कर सकती हैं । ये उनका पोटेंशियल है । तो ये सबसे आधारभूत स्वरूप है, पहला स्वरूप  है । आप इसकी नवजात शिशु से तुलना कर सकते हैं ।




ब्रह्मचारिणी:-

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दोस्तों मां दुर्गा का द्वितीय अवतार जो है  वह ब्रह्मचारिणी अवतार है और अगर इस अवतार की आप तुलना करें तो आप इस अवतार की तुलना एक विद्यालय जाने वाले शिशु से कर सकते हैं । शिशु पैदा हो गया,  शैलपुत्री, अब उसको विद्यालय जाना है क्योंकि अब जो  उम्र है वो सीखने की सही उम्र है और अब हमें अध्ययन  करना है । कठिन अनुशासन से ब्रह्मचर्य का पालन  करना है इसीलिए इस अवतार को ब्रह्मचारिणी बोला  गया है । अगर आप प्राचीन भारत में देखें तो प्रथम  जो 25 वर्ष होते थे, जब आप विद्यालय में पढ़ते थे,  गुरुकुल में पढ़ते थे, तो ब्रह्मचर्य का पालन  करना होता था । उसे ब्रह्मचर्य आश्रम बोला जाता था इसलिए इस अवतार को भी ब्रह्मचारिणी कहते हैं और  अगर आप स्वरूप को देखें तो मां जो है, उन्होने सफेद वस्त्र को धारण किया है और सफेद वस्त्र इस बात  को दिखाता है की हमें materialism से दूर जाना  है । ये उम्र जो हमारी है वो त्याग और तपस्या  की है । पूरा focus हमको अध्ययन में लगाना है,  इसलिए मां सफेद वस्त्र धारण की हैं और दोनों हाथों  में जिसमें एक में Kamandal है और एक में माला है,  वो उनका तपस्विनी स्वरूप है मतलब यह जो स्वरूप है यह  त्याग और तप का स्वरूप है । अपने जीवन को उत्कृष्ट  बनाने के लिए आपको प्रथम जो 25 वर्ष है इसमें मेहनत करनी होती है, सांसारिक प्रपंच से दूर जाना पड़ता  है और ऐसा हर विद्यार्थी को करना पड़ता है । अगर उसे  जीवन में सच में कुछ अच्छा करना है, कुछ अच्छी दिशा में आगे बढ़ाना है । इसीलिए इस स्वरूप की तुलना  आप विद्यालय में पढ़ने वाले, गुरुकुल में पढ़ने वाले एक शिशु से कर सकते हैं यही मां दुर्गा  के ब्रह्मचर्य अवतार के पीछे की मीनिंग है ।




चंद्रघंटा:-

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दोस्तों मां दुर्गा का तीसरा अवतार चंद्रघंटा है  और यह मां का सबसे संपन्न स्वरूप है । जहां पर आपने देखा की शैलपुत्री में दो ही हाथ थे, ब्रह्मचारिणी  में दो ही हाथ थे, यहां पर मां के 10-10 हाथ हैं । और जहां कुछ हाथ शस्त्रों से सुशोभित  हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ हाथों में कमल, घंटा,  kamandal और पानी का कलश है । तो यहां पर मां भक्ति  और शक्ति से परिपूर्ण हैं। मां का यह जो स्वरूप है  यह जैसे विद्यालय से, गुरुकुल से, जब बच्चा पढ़  लेता है और नौजवान हो जाता है और उसके पास ढेर  सारी skills आ जाती है । अब वो जीवन में तैयार हो  गया है किसी भी अपॉर्चुनिटी को grasp करने के लिए,  किसी भी तरह के संघर्ष के लिए, तो मां का यह स्वरूप  जो है उस विद्यार्थी की तरह है जिसने पढ़ाई पूरी कर  ली है जैसे माँ ने ब्रह्मचारिणी रूप में तपस्या  की, त्याग किया, और फिर उसके बाद जो है उनको इस  तरह की ढेर सारी विद्याओं का ज्ञान हो गया और उसके  बाद देखें तो मां के मस्तक पर तीसरी आंख भी खुल  गई है जो इस बात का प्रतीक है की मां अब किसी भी  तरह के संघर्ष के लिए तैयार हैं । वो Vigil हैं,  Vigilant हैं, अगर शत्रु आएंगे तो उनका  दमन करेंगी और अगर जरूरत पड़े तो धर्म की  स्थापना करेंगी तो जिस प्रकार एक विद्यार्थी  अपने जीवन के लिए पूर्णतया तैयार हो जाता है,  ढेर सारी skills को बटोर लेता है, तो माँ  का ये स्वरूप इस को रिप्रेजेंट करता है ।




कूष्मांडा:-

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दोस्तों मां दुर्गा का चौथा अवतार कूष्मांडा  है और अगर आप कूष्मांडा नाम को ध्यान से देखें, उसका संधि विच्छेद करें तो 'Koo' का मतलब होता है  'छोटा', लिटिल, 'Ushma' का मतलब होता है ऊर्जा या फिर heat और 'Anda' का मतलब तो आपको पता ही है, egg  होता है । तो ये जो मां का स्वरूप है ये कॉस्मिक Egg  का स्वरूप है और ऐसा माना जाता है की जब कुछ नहीं  था तब माँ ने ब्रह्मांड की रचना इसी स्वरूप से की थी तो इस स्वरूप की तुलना हम गर्भवती महिला से कर  सकते हैं की मतलब जैसे मां कूष्माण्डा ने ब्रह्मांड को रचा वैसे ही अब गर्भवती महिला भी एक नए जीवन  की रचना करने वाली है और अगर आप ध्यान से देखें तो इस स्वरूप में माँ एक मटका को भी लिए हुए हैं और  ऐसा माना जाता है की उसमें शहद या फिर अमृत होता है,  और अगर आप ध्यान दें तो हमारी पौराणिक कथाओ में  मटके को गर्भ का प्रतीक माना जाता है । बहुत ढेर  सारी कथाओ में आपको देखने को मिलेगा, सिंबॉलिक  रूप से, की मटकी से शिशु उत्पन्न हो रहे हैं तो  इसलिए मटके को गर्भ का प्रतीक माना जाता है । इसलिए  मां के स्वरूप में मटका है और मां के स्वरूप को एक गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और शक्ति के सिंबल की  तरह देखते हैं जो एक नए जीवन को उपजाने वाली है ।




स्कंदमाता:-

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दोस्तों हम नवरात्रि की पांचवें दिन मां दुर्गा  के पंचम अवतार स्कंदमाता की उपासना करते हैं । अब  जो माता शैलपुत्री के रूप में पुत्री थी,  अब वो मां बन गई हैं । अब उनकी पहचान जो है, वो एक मां के रूप में है इसलिए उनका नाम  उनके पुत्र स्कंद जो की भगवान कार्तिकेय हैं, उनकी माता के होने से है । मतलब अब वो स्कंदमाता  है । तो ये जो रूप है, स्वरूप है मां सकंदमाता का, ये एक माँ का स्वरूप है । जब कोई गर्भवती महिला मां  बन जाती है तो उसके स्वरूप की तुलना इस स्वरूप से कर सकते हैं और यहां पर अगर आप देखें तो मां ममतामयी  है, पुत्र वात्सल्य से परिपूर्ण है इसलिए यहां पर  उनके हाथ में कोई शस्त्र नहीं दिखाए गये हैं । अभी  उनका पूरा ध्यान अपने शिशु पर है । जैसे एक मां ममता  से भर जाती है, ममतामय हो जाती है और अपने शिशु  क ध्यान रखती है । इसीलिए मां सकंदमाता के स्वरूप  में आप देखें की उनकी गोद में उनके पुत्र स्कंद  भगवान भी बैठे हुए हैं और यह मां का जो स्वरूप  है यह मातृत्व का स्वरूप है इसीलिए स्कंदमाता को Goddess of motherhood भी बोला जाता है । तो मां दुर्गा के इस स्वरूप की तुलना हम एक माता से  कर सकते हैं जिसने अभी एक शिशु को जन्म दिया है ।




कात्यायनी:-

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दोस्तों मां दुर्गा का छठा अवतार कात्यायनी अवतार  है और इसी रूप में माँ दुर्गा ने महिषासुर का  

मर्दन किया था । जैसे जब एक स्त्री मां  बन जाती है तो वो सर्वशक्तिशाली हो जाती है, सर्वशक्तिमान हो जाती है । अब वो किसी पे  डिपेंड नहीं करती है । अपने बच्चों के लिए,अपने लिए, वो स्वयं में काफी होती है । तो मां  दुर्गा का स्कंदमाता के बाद मतलब जब वो मां बन   चुकी है तो अब वो स्वयं में शक्तिशाली हो गई हैं,  सर्वशक्तिमान हो गई हैं इसीलिए वो कात्यायनी रूप   को धारण करती हैं और कभी-कभी इस अवतार की शक्ति को  प्रदर्शित करने के लिए उनकी 18 भुजाएं भी दिखाई जाती हैं तो मां का ये जो स्वरूप है वो किसी भी स्त्री  के मां बनने के बाद जो उसके अंदर शक्ति आ जाती है उसका स्वरूप है । मां दुर्गा का यह शक्ति स्वरूप है  इसलिए इस स्वरूप को Goddess of Power भी बोलते हैं ।




कालरात्रि:-

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दोस्तों मां दुर्गा का सप्तम अवतार कालरात्रि है  जिसे हम काली भी बोलते हैं और कालरात्रि का अगर आप अर्थ देखें तो दो तरह के हमें अर्थ देखने को मिलते  हैं: एक कालरात्रि का अर्थ होता है की रात्रि की  तरह काला और दूसरा अर्थ होता है कालरात्रि का की  काल को निगल जान वाला । तो ये जो मां का रूप है ये बहुत प्रचंड प्रलय रूप है । मतलब यहां पर अंधेरे  से अगर आप meaning निकाले तो अंधेरे का मतलब है की सृष्टि का प्रलय हो गया है । जहां पर काल सृष्टि  को लील रहा है वहां काल को लील रही है काली । तो  माता दुर्गा का जो रूप है, ये बहुत क्रोध रूप है और  रौद्र रूप है । इसमें मां दुर्गा के सब्र का बांध  टूट चुका है और इसी रूप में उन्होने Raktabeej के  रक्त को पीकर Raktabeej का वध कर दिया था और उनके क्रोध की सीमा इतनी बढ़ गई थी की स्वयं उनके पति  शिव जी को आना पड़ा था उनको संभालने के लिए । तो माता दुर्गा का ये बहुत रौद्र रूप है जो ये दर्शाता  है की जहां एक स्त्री अपनी ममता से एक नए जीवन को रच सकती है, ब्रह्मांड को रच सकती है, वही समय आने पर  धर्म की स्थापना के लिए रुद्र रूप धारण करके जीवन को ग्रहण भी कर सकती है । जब ब्रह्मांड की रचना हो सकती  है तो ब्रह्मांड का प्रलय भी हो सकता है । इसलिए जहां पर एक स्त्री एक शिशु को जन्म दे  सकती है वहीं जरूरत पढ़ने पर वो जीवन  को ग्रहण भी कर सकती है। मां दुर्गा का यह  स्वरूप स्त्री का सबसे विकराल स्वरूप है ।




महागौरी:-

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दोस्तों पंचम अवतार में मां दुर्गा माता बनने के  बाद, स्कंदमाता बनने के बाद, अपनी शक्तियों के  उत्कृष्ट पद पर चली जाती हैं । जैसे की उन्होंने कात्यायनी रूप लिया जो की एक सर्वशक्तिशाली रूप  है । उसके बाद उन्होंने कालरात्रि रुप लिया जो उनका  रौद्र और बहुत क्रोध का रूप है । तो ये जो रूप हैं,  माता दुर्गा के सबसे परिपूर्ण रूप हैं, कंप्लीट रूप  हैं, उनके सबसे उग्र रूप हैं तो इसलिए आप देखिए की  षष्ठी, सप्तमी के बाद मां दुर्गा की जो पूजा अर्चना  है, उपासना है, वो बहुत तीव्र हो जाती है । सप्तमी,  अष्टमी, नवमी का बहुत महत्व है लेकिन जहां पर  मां दुर्गा ने कात्यायनी और कालरात्रि रूप में अपने रौद्र रूप की पराकाष्ठा को दिखाया वहीं उन्होंने ये भी बताया की वो शांति, सुंदरता, और सौम्यता की भी पराकाष्ठा पर जा सकती  हैं और वही ये स्वरूप है महागौरी का । तो मां दुर्गा का जो अष्टम अवतार है वो महागौरी का  अवतार है और महागौरी के स्वरूप में वो अपने पति शिव जी के साथ और अपने पुत्रों गणेश जी और  कार्तिक जी के साथ एक पारिवारिक सौहार्द के  रूप में रहती हैं तो यह जो स्वरूप है मां  दुर्गा का वो किसी भी स्त्री या पुरुष को उसके परिवार के उन्नति और सुख के प्रति जो  उसके उत्तरदायित्व हैं उसको याद दिलाता है । माँ दुर्गा का ये ये स्वरूप प्रेम पूर्ण स्वरूप  है । अब हम अंतिम स्वरूप की चर्चा कर लेते हैं।




सिद्धिदात्री:-

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दोस्तों मां दुर्गा का अंतिम रूप, नवम रूप,  सिद्धिदात्री रूप है और मां दुर्गा के इस स्वरूप की तुलना हम उस स्त्री से कर सकते हैं जिसे  जीवन के सभी अनुभवों का ज्ञान हो चुका है और अब इस ज्ञान का उपयोग करके वो अपने आगे आने वाली  पीढियों को धर्ममार्ग पर प्रशस्त करेंगी, मतलब मां दुर्गा के इस स्वरूप ने ब्रह्मांड की हर चीज को  जान लिया है, ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त कर ली है, अब उनके लिए कोई चीज अगम्य नहीं है । अगर उनके  भक्त उनसे कुछ भी मांगे, चाहे लौकिक या परलौकिक, हर चीज को वो पूर्ण करने में समर्थ हैं । जैसे  हमारी नानी और दादी होती हैं की नाती पोतों के   लिए कुछ भी कर जाती हैं । कितना भी कर जाएँ कम  लगता है । इसी प्रकार से मां दुर्गा का ये स्वरूप है । सिद्धिदात्री स्वरूप भक्तों पर अनंत कृपा  बरसाने वाला स्वरूप है । यह मां दुर्गा का अंतिम, पूर्ण, अनंत, असीम और दयावान स्वरूप है ।  




             तो दोस्तों मैं आशा करता हूं की मां दुर्गा के 9 अवतारों का हमारे जीवन के विभीन पड़ावों  के संदर्भ में क्या अर्थ है, ये आपको अच्छे से समझ में आ गया होगा।


  अगर आपको लेख पसंद आया है अपने परिवारजनों और दोस्तों में जरूर साझा करें। 



 समयगत एक नए विषय के साथ, एक नई लेख मे तब तक के लिए जय श्री राम ।

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“अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्”

मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥


विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥


पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥


जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥


परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥


श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥


न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥


नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९ ॥


आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १० ॥


जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११ ॥


मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२ ॥


“इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।”


FAQ


मां दुर्गा के 9 अवतारों का उपासना में क्या महत्व है?

उत्तर: मां दुर्गा के 9 अवतार विभिन्न शक्तियों को प्रतिष्ठित करते हैं और भक्तों को सभी जीवन पड़ावों में समर्थ बनाने में मदद करते हैं। उनकी उपासना से साधक धैर्य, साहस, बुद्धि, सम्मान, क्षमा, ज्ञान, शक्ति, आनंद और शांति के गुणों को प्राप्त करते हैं।

मां दुर्गा के अवतारों के साथ मानव जीवन में जुड़े कुछ उपयोगी संदेश हैं?

उत्तर: हां, मां दुर्गा के अवतारों के साथ मानव जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश हैं। उनके अवतार धर्म, नैतिकता, शक्ति, वीरता, और समर्पण के प्रतीक हैं। उनके अवतार अन्याय के खिलाफ लड़ने, सत्य की रक्षा करने, और उन्माद और अहंकार के विरुद्ध लड़ने के प्रेरक हैं। उनके उपासना से हमें धर्मनिरपेक्षता, समरसता, और सभ्यता की संदेहावशेषता को समझने में मदद मिलती है।

मां दुर्गा के प्रथम अवतार शैलपुत्री का रूप और संदेश क्या है?

उत्तर: शैलपुत्री का नाम शैल (पर्वत) और पुत्री (डॉटर) से बना है। यह मां दुर्गा का सबसे प्राचीन रूप है जो पर्वत की पुत्री के रूप में पैदा हुई है। इस अवतार में उनके दो हाथ हैं, एक में त्रिशूल (विध्वंस प्रतीक) और दूसरे में कमल (सौम्यता प्रतीक)। इससे प्रकट होता है कि मां दुर्गा का पोटेंशियल असीम है, वे असुरों को मार सकती हैं और साथ ही शांति, आनंद, और धर्म की स्थापना भी कर सकती हैं।

मां दुर्गा के अन्य रूपों में अष्टभुजा और 18 भुजाएं के क्या महत्व हैं?

उत्तर: अष्टभुजा मां दुर्गा के विकराल रूप में उपस्थित होते हैं जिनमें आठ हाथ होते हैं। ये उनकी अद्भुत शक्ति और अस्तित्व को प्रतिष्ठित करते हैं, जो असुरों के नाश के लिए एकाग्र क्रिया का प्रतीक होते हैं। साथ ही ये दिखाते हैं कि मां दुर्गा ने अपने विश्व के सभी दिशाओं में व्याप्त हैं। इसके बाद भी, जब वे अपने प्रारंभिक रूप में पैदा हुई थीं, तो उनके पास केवल दो हाथ थे, जिससे प्रदर्शित होता है कि उनमें अभी बहुत सारे पोटेंशियल हैं और वे नवजात शिशु की तरह हैं।

मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी अवतार का प्रमुख संदेश क्या है?

उत्तर: ब्रह्मचारिणी अवतार में मां दुर्गा ने सफेद वस्त्र पहना है, जो सांसारिक प्रपंच से दूर जाने को प्रेरित करता है। इस अवतार में उनके पास दो हाथ हैं, एक में कमंडल (कलश) और दूसरे में माला है। यह उनका तपस्विनी स्वरूप दर्शाता है जिसमें त्याग और तप का अभ्यास होता है। इस रूप के माध्यम से, मां दुर्गा हमें उत्कृष्ट जीवन के लिए महत्वपूर्ण तपस्या और संयम का संदेश देती हैं।

ब्रह्मचारिणी अवतार के अनुसार हम अपने जीवन को कैसे बेहतर बना सकते हैं?

उत्तर: ब्रह्मचारिणी अवतार के संदेश के अनुसार, जो विद्यालय जाने वाले शिशु के उसी उम्र को संदर्भित करता है, हमें अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए उपास्य गुणों पर संरेखित रहने की आवश्यकता है। यह शिक्षा, तपस्या, और समर्पण के लिए समर्पित होने का संकेत है। हमको सांसारिक प्रतिष्ठा और सुख से परे जाने की अभिवृद्धि करनी चाहिए और अपने जीवन के मूल्यांकन में शिक्षा और ध्यान के बल पर प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे हम अध्ययन और समृद्धि की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।

मां दुर्गा के चंद्रघंटा अवतार का प्रमुख संदेश क्या है?

उत्तर: चंद्रघंटा अवतार में मां दुर्गा के 10-10 हाथ होते हैं और उन्हें शस्त्रों से सुशोभित किया जाता है, जो शक्ति का प्रतीक है। इस अवतार में उनके पास कमल, घंटा, कमंडल और पानी का कलश भी होते हैं, जो उनके भक्ति और शक्ति से परिपूर्णता को दर्शाते हैं। मां दुर्गा इस रूप में अपने शक्तिशाली स्वरूप को प्रकट करती हैं, जो उन्हें संघर्ष के लिए तैयार बनाता है और धर्म की स्थापना करने के लिए विगिलेंट रहने का संदेश देता है।

चंद्रघंटा अवतार के संदेश के आधार पर, हम अपने जीवन में कैसे सशक्त बन सकते हैं?

उत्तर: चंद्रघंटा अवतार के संदेश के अनुसार, हमें अपने जीवन में शक्ति का सामर्थ्य विकसित करने के लिए उच्च धार्मिक भावना और नैतिकता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। इस अवतार का संदेश हमें संघर्षों के लिए तैयार बनाता है और धर्म की स्थापना के लिए सच्चे और सजग होने का संकेत देता है। यह हमें आत्मविश्वास, समर्पण, और समर्थन की आवश्यकता को समझाता है ताकि हम अपने जीवन में सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंच सकें।

मां कूष्मांडा का स्वरूप कौनसे संदेश को प्रकट करता है?

उत्तर: मां कूष्मांडा का स्वरूप "कॉस्मिक एग्ग" के रूप में जाना जाता है जिससे संदेश मिलता है कि उन्होंने ब्रह्मांड की रचना की थी। इस स्वरूप में मां एक मटका भी धारण करती हैं, जिसमें शहद या अमृत का संकेत होता है। पौराणिक कथाओं में भी मटका को गर्भ का प्रतीक माना जाता है। मां कूष्मांडा के स्वरूप को गर्भवती महिला की शक्ति के सिंबल के रूप में देखा जाता है, जो एक नए जीवन की रचना करने वाली है।

मां सकंदमाता को गोद में उनके पुत्र स्कंद भगवान के साथ देखा जाता है, इसका क्या संदेश है?

उत्तर: मां सकंदमाता को गोद में उनके पुत्र स्कंद भगवान के साथ देखने से उनका स्वरूप "मातृत्व का स्वरूप" प्रकट होता है। वे "गॉडेस ऑफ मदरहुड" के रूप में भी जानी जाती हैं, क्योंकि उनके हाथों में शस्त्र नहीं होते और उनका पूरा ध्यान अपने शिशु पर होता है। इससे संदेश मिलता है कि माँ की ममता और वात्सल्य भावना से परिपूर्ण होने के कारण उनका स्वरूप मातृत्व का रूप है जिससे हम एक गर्भवती महिला की तुलना कर सकते हैं, जो अभी एक शिशु को जन्म दिया है।

मां कात्यायनी को स्वयं में शक्तिशाली और सर्वशक्तिमान होने का स्वरूप कहा जा रहा है, इससे हमारे जीवन में कैसे उपयोगी संदेश मिलता है?

उत्तर: मां कात्यायनी के अवतार में दिखाए जाने वाले स्वरूप से हमे यह संदेश मिलता है कि एक स्त्री जब मां बन जाती है, तो वो अपने आप में शक्तिशाली बन जाती है और स्वयं को सर्वशक्तिमान महसूस करती है। उन्हें किसी पर डिपेंड नहीं करना पड़ता है, और वे अपने बच्चों और अपने लिए स्वयं में पूर्णतः पर्याप्त होती हैं। इससे हमे यह समझ मिलता है कि महिलाएं अत्यंत शक्तिशाली होती हैं और जब वे मां बनती हैं, तो उन्हें अपने शक्ति का अनुभव होता है जो उन्हें सर्वशक्तिमान बनाता है। इसलिए, मां कात्यायनी को "गॉडेस ऑफ पॉवर" भी कहा जाता है।

मां दुर्गा के सप्तम अवतार, कालरात्रि, का रूप क्रोध और रौद्र से भरा हुआ है। इसका मतलब क्या है और यह मां का स्वरूप हमें क्या सिखाता है?

उत्तर: मां कालरात्रि का रूप क्रोध और रौद्र से भरा हुआ है, जो सृष्टि का प्रलय कर सकता है और रात्रि की तरह काला है। यह उनकी प्राकृतिक शक्ति और नारी की माँ के रूप में अद्भुत शक्ति को दर्शाता है। जब एक महिला माँ बनती है, तो उसके अंदर यह स्वरूप उत्पन्न होता है जो उसे अपने बच्चे की रक्षा के लिए अद्भुत शक्ति प्रदान करता है। यह मां के स्वरूप से हमें यह सिखाता है कि महिलाएं अत्यंत शक्तिशाली होती हैं और जब वे मां बनती हैं, तो उन्हें अपने अंदर छुपी हुई अद्भुत शक्ति का अनुभव होता है। इसलिए, मां दुर्गा के सप्तम अवतार का यह स्वरूप स्त्री की शक्ति और दृढ़ता का प्रतीक है और इसलिए उन्हें "गॉडेस ऑफ पॉवर" भी कहा जाता है।

मां दुर्गा के आठवें अवतार, महागौरी, का रूप क्या है और इसका महत्व क्या है?

उत्तर: मां दुर्गा के आठवें अवतार, महागौरी, के रूप में वे अपने पति शिव जी और पुत्रों, गणेश जी और कार्तिक जी, के साथ एक पारिवारिक सौहार्द के रूप में रहती हैं। यह स्वरूप स्त्री और पुरुष दोनों को उनके परिवार के सुख और उन्नति के प्रति जिम्मेदार बनाता है। मां दुर्गा के इस प्रेमपूर्ण स्वरूप का महत्व क्या है, यह यह बताता है कि परिवार में प्रेम, समर्थन और सौहार्द का महत्व होता है और इसके माध्यम से हम सभी उन्नति और समृद्धि को प्राप्त कर सकते हैं।

मां दुर्गा के नवम रूप, सिद्धिदात्री, का महत्व और उसके स्वरूप के विशेषताएं क्या हैं?

उत्तर:मां दुर्गा के नवम रूप, सिद्धिदात्री, भक्तों पर अनंत कृपा बरसाने वाला स्वरूप हैं। इस स्वरूप में मां दुर्गा ने ब्रह्मांड की हर चीज को जान लिया है और विजय प्राप्त कर ली हैं, जिससे उन्हें अगम्य नहीं रहा। उनके भक्तों के लिए वे हर प्रकार की मांग पूरी करने में समर्थ हैं, जैसे नानी और दादी हमारे लिए करते हैं। सिद्धिदात्री स्वरूप विशेषता से भरा हुआ है, जो उन्हें अंतिम, पूर्ण, अनंत, असीम और दयावान बनाता है।

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