देवता किसे कहते हैं? | वैदिक देवों का स्वरूप

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देवता किसे कहते हैं?

देवता किसे कहते हैं? | वैदिक देवों का स्वरूप

    देवों के स्वरूप पर विचार करने से पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है कि देवता किसे कहते हैं? देव या देवता का अभिप्राय है-कोई दिव्य शक्ति । वह शक्ति जो मानव-जगत् का कुछ उपकार करती है, उसे किसी रूप में कुछ देती है या जिसमें कुछ दिव्य या असाधारण क्षमता है, उसे देवता कहा जाता है। अतएव यास्क ने देव शब्द का निर्वचन दिया है कि-

देवो दानाद् वा, दीपनाद् वा, द्योतनाद् वा, द्युस्थानो भवतीति वा ।

निरुक्त ७.१५

    अर्थात् देव वह है जो कुछ देता है, स्वयं प्रकाशमान है या दूसरे को प्रकाशित करता है या द्युलोकस्थ है। इस दृष्टि से पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, मेघ आदि देव हैं, क्योंकि ये संसार का उपकार कर रहे हैं।

      अतएव वैदिक ऋषियों ने कृतज्ञता-स्वरूप इनको देव या देवता कहा है तथा इनके अनुग्रह की कामना की है। जिस देवता को लक्ष्य में रखकर मंत्र की रचना हुई है, वह उस मंत्र का देवता होता है। मंत्रों के ऊपर लिखे गए देवता का अभिप्राय है, मंत्र का वर्ण्य विषय । उस मंत्र में उस विषय का प्रतिपादन है। मंत्र के द्वारा देवों या दिव्य शक्तियों का आह्वान किया जाता है। यही भाव यास्क ने निरुक्त (७.१) में दिया है।


२. देवों का स्वरूप

      देवों का स्वरूप उनकी प्रकृति पर निर्भर है। कुछ देव मानववत् कार्य करते हैं। जैसे-इन्द्र, वरुण, मरुत् आदि। इनके अंगों आदि का भी वर्णन मिलता है। इनके लिए यास्क ने कहा है कि कुछ देव मनुष्य के तुल्य हैं, उनकी सचेतन के तुल्य स्तुति की जाती है। कुछ मनुष्यों के तुल्य नहीं है। जैसे- अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि । इनकी अचेतन के तुल्य स्तुति की जाती है।


पुरुषविधाः स्युः, इत्येकम् । चेतनावद् हि स्तुतयो भवन्ति ।

अपुरुषविधाः स्युः, इत्यपरम् ।   निरुक्त ७.६ और ७


    यास्क ने निरुक्त में इन्द्र, अग्नि आदि देवों की चार प्रकार की व्याख्या प्रस्तुत की है- १. आध्यात्मिक, २. आधिदैविक, ३. आधिभौतिक और ४. अधियज्ञ । यास्क ने विभिन्न व्याख्या-पद्धतियों का आश्रय लेकर कहा है कि इन्द्र-वृत्र आदि का अर्थ इतिहासपरक, आख्यानपरक, प्राकृतिक पदार्थ या निर्वचनात्मक किए जाते हैं। यास्क इन्द्र, अग्नि, मस्तु, वरुण, अश्विनी आदि देवों को रूढ शब्द न मानकर यौगिक शब्द मानते हैं, अत: ऐश्वर्य-संपन्नता का सूचक इन्द्र शब्द देवों का राजा, परमात्मा, जीवात्मा, विद्युत्, सूर्य आदि अर्थों का बोधक होता है। इस पद्धति को नैरुक्त प्रक्रिया कहते हैं। स्वामी दयानन्द आदि ने इस पद्धति को अपनाया है।


३. देवों की संख्या

    वेदों में देवों की संख्या १ से लेकर ६ हजार तक बताई गई है। ऋग्वेद का स्पष्ट कथन है कि मूलरूप में एक ईश्वर की ही सत्ता है, उसको ही विद्वानों ने इन्द्र मित्र वरुण आदि अनेक नाम दिए हैं।' यास्क ने भी निरुक्त में इसी बात का समर्थन किया है और कहा है कि वह एक मूलसत्ता (ईश्वर) महाशक्तियुक्त है। उसकी विभिन्न शक्तियों को ही अनेक नाम दे दिए जाते हैं। शौनक ने भी बृहद देवता में इसका ही उल्लेख किया है।

    तीन देवता-ऋग्वेद ने उल्लेख किया है कि तीन मुख्य देव हैं। पृथ्वी पर अग्नि, अन्तरिक्ष में वायु या इन्द्र तथा द्युलोक में सूर्य । यास्क ने इसी आधार पर तीन देव माने हैं-अग्नि, वायु या इन्द्र तथा सूर्य। ये क्रमशः तीनों लोकों के अधिष्ठाता देवता हैं।


 * सूर्यो नो दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षाद् अग्निर्नः पार्थिवेभ्यः । ऋग्० १०.१५.१


   ३३ देवता-

ऋग्वेद और अथर्ववेद में ३३ देवों का उल्लेख है-११ पृथ्वी पर, ११ अन्तरिक्ष में और ११ द्युलोक में।" शतपथ ब्राह्मण (११.६.३.५) और ऐतरेय ब्राह्मण (१२.११.२२) में इन ३३ देवों के नाम मिलते हैं। ये हैं-८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, द्यौः और पृथिवी (या इन्द्र, प्रजापति ) ।


३३३९ देवता-यजुर्वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि ३३३९ देवता हैं और ये सब अग्नि की पूजा करते हैं।


त्रीणि शता त्री सहस्त्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन् ।.       यजु० ३३.७


६ हजार देवता- अथर्ववेद के एक मंत्र में देवों की संक्षिप्त और विस्तृत संख्या इस प्रकार दी गई है-३३ देवता, ३०० देवता और ६ हजार देवता । संक्षिप्त संख्या 


१. इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः,

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति अग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः । ऋ० १.१६४.४६


२. माहाभाग्याद् देवताया एक एवात्मा बहुधा स्तूयते । निरुक्त ७.४

३. बृहद् देवता १.७१ से ७३


४. तिस्र एव देवता इति नैरुक्ताः । अग्निः पृथिवीस्थानः । वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः । सूर्योस्थानः । निरुक्त ७.५


५. ये देवासो दिवि-एकादश स्थ, पृथिव्यामध्येकादश स्थः । अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ, ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ।।. १.१३९.११ ऋ०


दिवि एकादश, अन्तरिक्षे एकादश, पृथिव्याम् एकादश० । अ० १९.२७.११ से १३



३३ है, उससे विस्तृत ३०० है और उससे विस्तृत ६ हजार है। ये देवता अपनी विभूतियों के विस्तार से ६ हजार या उससे भी अधिक हो जाते हैं। जैसा कि यजुर्वेद में वर्णन है कि वह रुद्र एक होता हुआ भी हजारों या असंख्य रूपों में पृथिवी पर है ।


(क) देवा:...........त्रयस्त्रिंशत् त्रिशतः षद् सहस्राः । अ० ११.५.२

(ख) असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूप्याम् । यजु० १६.५४

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एकेश्वरवाद-

         ऋग्वेद में 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' द्वारा जो एक देवता या एकेश्वरवाद का समर्थन किया गया है, उसका यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी पूर्ण समर्थन हुआ है। विश्व में एक सर्वशक्तियुक्त सत्ता या ऊर्जा (Universal Energy) विद्यमान है, उसको वेदों में वैश्वानर अग्नि कहा गया है। इस मूल सत्ता या ऊर्जा के ही अंग-प्रत्यंग विविध देव हैं। अपने गुण-विशेष के कारण इनके इन्द्र, मित्र, वरुण, यम आदि नाम पड़े हैं। यह है बहुदेवत्व की स्वीकृति के बाद एकदेवत्व की मान्यता का आधार । ऊर्जा का मूल स्रोत एक है। कार्य-वैविध्य के कारण नाना- देवत्व है। अपने गुण-धर्मों के आधार पर देवों के विभिन्न नाम पड़े हैं। अत एव ऋग्वेद का कथन है कि उस एक सुपर्ण को विद्वान् अनेक नामों से निर्दिष्ट करते हैं।' यजुर्वेद का कथन है कि उस एक विराट् पुरुष (ईश्वर) को ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र (वीर्य), ब्रह्म, जल और प्रजापति कहते हैं।' अथर्ववेद का कथन है कि उस एक परमेश्वर के ही अनेक देववाचक नाम हैं। उसको ही इन्द्र, महेन्द्र, विष्णु, प्रजापति आदि कहते हैं।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि एकेश्वरवाद का मन्तव्य अर्वाचीन न होकर अतिप्राचीन है और यह वैदिक ऋषियों की सूक्ष्म चिन्तन-शक्ति का परिचायक है।


४. वैदिक देवों का वर्गीकरण

यास्क ने वैदिक देवों को तीन वर्गों में बाँटा है

१. पृथिवी - स्थानीय, 

२. अन्तरिक्ष-स्थानीय, 

३. द्युस्थानीय। 


इनमें प्रमुख देव ये हैं- 

१. पृथिवीस्थानीय देवता-

अग्नि, सोम, बृहस्पति, त्वष्टा, प्रजापति, विश्वकर्मा,

अदिति-दिति आदि देवियाँ, नदियाँ आदि ।


२. अन्तरिक्ष-स्थानीय देवता-

इन्द्र, मातरिश्वा (मातरिश्वन्), रुद्र, मरुत्, पर्जन्य, आप: (जल), अपांनपात्, त्रित आप्त्य, अहिर्बुध्न्ध आदि ।


३. द्युस्थानीय देवता-

आदित्य, सविता (सवितृ), सूर्य, पूषा (पूषन्), मित्र,वरुण, अर्यमा (अर्यमन्), अश्विनौ आदि ।


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