भगवान के भक्त चार प्रकार के होते हैं: आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु, और ज्ञानी। आप खुद जानें कौनसी श्रेणी में हैं।

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कितने प्रकार के होते हैं भगवान के भक्त ? जानिये आप किस श्रेणी मे आते हैं?

 श्रवण कीर्तन विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
 अर्चनं वन्दन दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
~ (श्रीमद्भा० 7.5.23 )


अर्थात् भगवान श्री हरि विष्णु के गुणों का श्रवण और कीर्तन भगवान का स्मरण चरणों की सेवा पूजन वंदन दास और सखा बनकर उनके समक्ष आत्म समर्पण करना यही नवधा अर्थात वास्तविक भक्ति है।


भक्त का अर्थ

     भगवान्‌की कथाका श्रवण, भगवन्नामका संकीर्तन, भगवान्‌का स्मरण, भगवान्‌के श्रीचरण­कमलका सेवन, भगवान्‌का पूजन, भगवान्‌का वन्दन, भगवान्‌के प्रति दास्य भाव, भगवान्‌के प्रति सख्य अर्थात् विश्वास और मित्रता, और भगवान्‌के प्रति आत्मनिवेदन अर्थात् सर्वसमर्पण – यही नवधा भक्ति है।



कितने प्रकार के होते हैं भगवान के भक्त ? जानिये आप किस श्रेणी मे आते हैं?भगवान के भक्त चार प्रकार के होते हैं: आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु, और ज्ञानी। आप खुद जानें कौनसी श्रेणी में हैं।

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आज की प्रस्तुति में हम आपको श्री वेद व्यास जी द्वारा सनातनी धर्म ग्रंथो के माध्यम से यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि वास्तव में भगवान के भक्त कितने प्रकार के होते हैं और उनमें से उच्च और निम्न प्रकार के भक्ति कौन-कौन से होते हैं। और कौन सी श्रेणी के भक्ति भगवान श्री हरि को अत्यधिक प्रिय है। तो चलिए विस्तार से जाने का प्रयास करते हैं।


जिसने भी इस पृथ्वी पर जन्म लिया है और जो ईश्वर में विश्वास रखता है वह ईश्वर की भक्ति अवश्य करता है। जो सर्वव्यापी है अनादि है और अनंत है उसे ब्रह्म कहा जाता है अथवा जिसे ईश्वर भी कहा जाता है पृथ्वी पर जन्म लेने वाले अधिकांश मनुष्य उस एक परमेश्वर में उसके अलग-अलग रूपों के माध्यम से उसमें आस्था रखते हैं और उस की भक्ति करते हैं।  परंतु हर मनुष्य का भक्ति करने का ढंग भिन्न होता है सभी अपनी ओर से ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं प्रत्येक मनुष्य अपने कठिन समय में हमेशा उस परमेश्वर का अवलोकन करते हैं खुशी के क्षणों में उन्हें धन्यवाद देते हैं और अंतः यह महसूस करते हैं कि हम अपने आसपास के विभिन्न लोगों के साथ उनकी स्थिति शक्ति और उपयोगिता के आधार पर भेदभाव कर सकते हैं। लेकिन भगवान कभी भी ऐसा भेदभाव नहीं करते हैं वह तो एक नदी की तरह है जो गुजरने वाली हर एक चीज को पौषित करती है नदी अपने आसपास आने वाले हर प्राणी को जल प्रदान करती है लेकिन यदि नदी जल देते समय भी भेद ना करें तो भी साधक को उसके बर्तन के आकार के आधार पर उसे अलग-अलग मात्रा में जल मिल सकता है। इसी तथ्य के समान भगवान भी किसी से द्वेष या भेदभाव नहीं रखते परंतु अलग-अलग भक्त अपने अलग-अलग उद्देश्य को लेकर उनका अनुस्मरण करते हैं और इसलिए भगवान से उसी के अनुसार सम रस  प्राप्त होता है। इसलिए श्रीमद् भागवत गीता में सर्वोच्च परमेश्वर श्री कृष्ण ने धनंजय के समक्ष विभिन्न मनुष्यों के भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के आधार पर चार अलग-अलग प्रकार के भक्तों को परिभाषित किया है साथ ही उन्होंने अपने अत्यंत प्रिय भक्त के विषय में भी बताया है वे कहते हैं कि -


 चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
 आर्ती जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
।।7.16।।

अर्थात हे भरत श्रेष्ठ यह चार प्रकार के भक्त हैं जो मुझे भजते हैं अर्थात जो मेरी भक्ति में लीन रहते हैं वे इस प्रकार हैं।

 हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले (सुकृतिन:) आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं।। पहला है:-


 आर्त भक्त :-

यह वे लोग हैं जो या तो शारीरिक स्तर से दर्द और पीड़ा का अनुभव कर रहे हो या मानसिक स्तर से । कुछ लोग भगवान को केवल तभी याद करते हैं जब उन्हें किसी प्रकार का कष्ट होता है जब वे दुख और समस्याओं से घिरे हुए हो वे अपने इस जीवन से बहुत हताश एवं परेशान हो और उन्हें इस जीवन से कोई उम्मीद ना हो। ऐसे परिदृश्य में जब वे पूरी तरह से टूट चुके होते हैं तथा हर तरफ से दुख से चूर होते हैं तभी उन्हें भगवान पर विश्वास हो होता है और वह एकमात्र ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनकी ओर से अभी भी उम्मीद खत्म नहीं हुई है वे अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भगवान का स्मरण करते हैं और इसलिए उन्हें आर्त कहा जाता है हालांकि आर्त उच्च स्तर के भक्त नहीं है परंतु भगवान के प्रति उनकी भक्ति उनके दर्द का परिणाम है फिर भी यह समझा जाना चाहिए कि हमारे जीवन के सबसे कठिन समय में भगवान पर विश्वास रखना आसान नहीं होता है और इसलिए यदि कोई व्यक्ति कठिन समय में भी भगवान पर अपना भरोसा और विश्वास बनाए रखने में सक्षम होता है तो यह एक अच्छा संकेत है और वह व्यक्ति स्वयं भगवान के भक्तों में से एक कहलाता है यह निम्न कोटि से थोड़े श्रेष्ठ होते हैं। दूसरा है :-


 अर्थार्थी भक्त :-

यह भक्त भौतिक धन संतान नाम और प्रसिद्धि की इच्छाओं के साथ भगवान का अवलोकन करते हैं। अर्थात जो लोग ईश्वर को केवल और केवल लोभ यानी धन वैभव सुख समृद्धि आदि के लिए ही ईश्वर का स्मरण करते हो ऐसे लोगों के लिए भगवान से ज्यादा भौतिक सुख सर्वोपरि होता है। हालांकि ऐसे लोगों की भगवान के प्रति भक्ति केवल धन और विशिष्ट इच्छाओं के लिए होती है किंतु फिर भी उन्हें भक्त कहा जाता है क्योंकि किन्हीं कारणों से वे भगवान से जुड़े होते हैं एवं इस प्रकार के भक्त को अर्थार्थी यानी निम्न कोटि के भक्त की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि इस प्रकार के भक्त बार-बार उच्च एवं निम्न योनियों में पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं तथा अतिशय सुख और दुख भोगते हैं यह भक्त अपने अज्ञान के कारण वश कभी भी जन्म और मरण से मुक्त नहीं हो पाते अर्थात यह भक्त कभी भी शांत ब्रह्म को प्राप्त नहीं होते। तीसरा है:-


 जिज्ञासु भक्त :-

 यह वे भक्त हैं जो भगवान को अपनी निजी समस्याओं के लिए याद ना करके बल्कि संसार में फैले हुए अनित्य को देखकर ईश्वर की खोज में लगे रहते हैं और ईश्वर की निरंतर भक्ति करते हैं। यह भगवान के विषय में और अधिक जानना चाहते हैं यह भक्त केवल और केवल सत्य अथवा ब्रह्म के विषय में अधिक जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। वे धर्म ग्रंथों और अन्य साहित्यो का ज्ञान अर्जित करते हैं और अनंत ईश्वर की अधिक गहराई की खोज करने के माध्यम और साधनों का पता लगाने की कोशिश करते हैं वे जिज्ञासु भक्त कृष्ण को बहुत प्रिय हैं। चौथा है :-


 ज्ञानी भक्त :-

 यह वे भक्त होते हैं जिन्होंने अंततः ईश्वर को पहचान लिया है उन्हें उनकी रचना और संपूर्ण ब्रह्मांड का सच्चा ज्ञान होता है वे ब्रह्म को समझते हैं और जीवन की सभी कर्म विशिष्ट सीमाओं से मुक्त हो गए हैं ऐसे भक्तों द्वारा उस सच्चिदानंद घन ब्रह्म को पहचाना जा चुका है वह केवल ईश्वर में स्थित रहते हैं वह भगवान से किसी भी प्रकार की कोई इच्छा नहीं रखते एवं वे भक्त निरंतर केवल भगवान को अपने मन में रखकर अपना निर्धारित कर्म एवं कर्मफल से रहित अथवा निष्काम कर्म करते रहते हैं तथा एक दिन केवल ब्रह को ही प्राप्त होते हैं ईश्वर ऐसे भक्तों पर हमेशा अपनी कृपा रखते हैं और हमेशा अपने भक्त की रक्षा करते हैं ऐसे भक्त ही ईश्वर की आत्मा होते हैं अर्थात केवल ज्ञानी भक्त ही उनको सर्वोपरि हैं तथा उनका कभी भी पुनरागमन नहीं होता है वे भगवान में स्थित रहते हैं तो यह था स्वयं भगवान के मुख से निकला हुआ अमृत रूपी ज्ञान जिसमें उन्होंने चार प्रकार के भक्तों के बारे में विस्तार से हमारा मार्गदर्शन किया उन्होंने बताया कि यही चार प्रकार के भक्त हैं जो मेरा अमरण करते हैं परेशान भौतिक इच्छाएं रखने वाला जिज्ञासु एवं पूर्ण ज्ञान रूपी भक्त इनके अतिरिक्त कोई भी अन्य भक्त नहीं है।


 हम आशा करते हैं कि आपको यह जानकारी अच्छी लगी होगी।


 हम हृदय की अनंत गहराइयों से आपका कोटि कोटि धन्यवाद करते हैं अपनी अगली प्रस्तुति में हम आपको एक नई जानकारी देने का प्रयास करेंगे एक बार फिर से आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जय हिंद जय भारत


FAQ


क्या है भगवान के प्रति नौ भक्तियों का विवरण?

नौ भक्तियाँ श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, और आत्मनिवेदन से होती हैं।

आर्त भक्त कौन होता है?

जो भगवान को केवल कष्ट और पीड़ा के समय ही याद करता है, उसे आर्त भक्त कहा जाता है।

अर्थार्थी भक्त कौन होता है?

जो भगवान को धन, संतान, नाम, और प्रसिद्धि के लिए याद करता है, उसे अर्थार्थी भक्त कहा जाता है।

जिज्ञासु भक्त कौन है?

जो भगवान को जानने की इच्छा रखकर ईश्वर की खोज में लगा रहता है, उसे जिज्ञासु भक्त कहा जाता है।

ज्ञानी भक्त कौन है?

जो भगवान को पहचान लेता है और ब्रह्म को समझता है, उसे ज्ञानी भक्त कहा जाता है।

भगवान के प्रति सबसे प्रिय भक्त कौन होता है?

भगवान के प्रति सर्वोच्च प्रेम और समर्पण के साथ भगवान का स्मरण करने वाला ज्ञानी भक्त होता है।

भक्ति में अभ्यास का महत्व क्या है?

भक्ति में अभ्यास करना मानव को भगवान के प्रति समर्पित बनाता है और आत्मा के साथ मिलन का मार्ग दिखाता है।

भक्ति में आत्मनिवेदन का मतलब क्या है?

आत्मनिवेदन भक्ति का एक रूप है जिसमें भक्त अपनी सभी क्रियाओं को भगवान के लिए समर्पित करता है।

भक्ति का क्या महत्व है जीवन में?

भक्ति जीवन को आदर्श, प्रेम, शांति, और सांत्वना से भर देती है और आत्मा को दिव्यता की दिशा में मार्गदर्शन करती है।

भक्ति में सच्चा समर्पण क्यों महत्वपूर्ण है?

सच्चा समर्पण भक्ति को पूर्ण बनाता है, क्योंकि भक्त अपनी पूरी आत्मा को भगवान के सेवा में समर्पित करता है और उसके प्रति पूर्ण प्रेम और विश्वास के साथ कर्म करता है।

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