नचिकेता और यम - कठोपनिषद्
“पिताजी, आप मुझे किसे देंगे?” उसने फिर पूछा, और तीसरी बार भी। उसके पिता मुड़े। “मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ।”
कठोपनिषद् से
1. एक ऐसा दान जिसमें कुछ खोया नहीं
कठोपनिषद् में वाजश्रवा
नाम का एक व्यक्ति स्वर्ग चाहता था। इसलिए उसने विश्वजित् यज्ञ किया, वह यज्ञ जिसमें
मनुष्य अपना सब कुछ दान कर देता है। उसका एक पुत्र था, नचिकेता नाम का बालक।
जब गायें पुरोहितों
को दान देने के लिए ले जाई जा रही थीं, तब बालक उन्हें देख रहा था। बूढ़ी गायें, जिनका
दूध सूख चुका था, जो अब बछड़ा देने योग्य भी नहीं थीं: ऐसा दान जिसमें उसका कुछ नहीं
गया। यदि देने में हमने कुछ खोया ही नहीं, तो हमने कुछ दिया ही नहीं।
और उस बालक में,
छोटी उम्र के होते हुए भी, श्रद्धा प्रविष्ट हुई: अपने पिता की चिंता से जन्मी श्रद्धा।
ऐसे दान स्वर्ग में नहीं, बल्कि आनंदरहित लोकों में ले जाते हैं।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.1
उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं
ददौ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र
आस॥
अर्थ: फल की कामना से वाजश्रवा ने अपना सारा धन दान कर दिया। उनका नचिकेता नाम का एक
पुत्र था।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.2
तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु
नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत॥
अर्थ: जब दक्षिणा की गायें ले जाई जा रही थीं, तब उस बालक में, छोटा होने पर भी, श्रद्धा
प्रविष्ट हुई और उसने सोचा:
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.3
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा
निरिन्द्रियाः।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्
स गच्छति ता ददत्॥
अर्थ: जिन गायों ने पानी पी लिया, घास चर ली, दूध दे दिया और जो निर्बल हो चुकी हैं,
ऐसी गायों को देने वाला व्यक्ति आनंदरहित लोकों में जाता है।
2. “मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ”
उसके पिता ने सब
कुछ देने का संकल्प लिया था, और एक चीज़ उन्होंने नहीं दी थी: अपना पुत्र। “पिताजी,
आप मुझे किसे देंगे?” पिता ने उत्तर नहीं दिया। उसने फिर पूछा, और फिर पूछा। “एक बालक
का यह आचरण उचित नहीं,” पिता ने सोचा, और क्रोध में बोले, “मैं तुम्हें मृत्यु को देता
हूँ।”
अकेले में बालक ने
सोचा, “पिताजी ने क्रोध में कहा है। फिर भी उनका वचन झूठा नहीं होना चाहिए।” पर पिता
का क्रोध तब तक शोक में बदल चुका था। “मैंने यह क्या कह दिया?” बालक ने कहा, “पिताजी,
अपना वचन निभाइए। मुझे यम के पास भेज दीजिए।” और अपना वचन सत्य रखने के लिए पिता ने
उसे भेज दिया।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.4
स होवाच पितरं तात कस्मै मां
दास्यसीति।
द्वितीयं तृतीयं तं होवाच
मृत्यवे त्वा ददामीति॥
अर्थ: उसने पिता से कहा, “पिताजी, आप मुझे किसे देंगे?” दूसरी बार और तीसरी बार भी
पूछा। तब पिता ने उससे कहा, “मैं तुझे मृत्यु को देता हूँ।”
3. मृत्यु के द्वार पर तीन रातें
यम घर पर नहीं थे।
तीन रातों तक बालक बिना अन्न और जल के उनके द्वार पर प्रतीक्षा करता रहा। जब यम घर
लौटे, तो उनके परिवारजन उनसे मिले। “अतिथि अग्नि की तरह घर में प्रवेश करता है,” उन्होंने
कहा। “यम, उसके लिए जल ले जाइए।” “जो गृहस्वामी अतिथि को भूखा जाने देता है,” उन्होंने
चेतावनी दी, “वह सब कुछ खो देता है: अपनी आशाएँ, अपने पुण्य कर्म, अपने पुत्र, अपने
पशु।”
तब यम बालक के पास
गए। “तुमने तीन रातें मेरे द्वार पर बिना कुछ खाए प्रतीक्षा की। तुम्हें नमस्कार। प्रत्येक
रात के लिए एक वर माँगो।” मृत्यु ने एक बालक के सामने सिर झुकाया।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.7
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो
गृहान्।
तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति
हर वैवस्वतोदकम्॥
अर्थ: ब्राह्मण अतिथि वैश्वानर अग्नि के समान घरों में प्रवेश करता है। लोग उसे इस
प्रकार शांत करते हैं: “हे वैवस्वत (यम), जल ले आइए।”
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.8
आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां
च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान्।
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥
अर्थ: जिस अल्प बुद्धि वाले व्यक्ति के घर ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन के रहता है, उसकी
आशा, प्रतीक्षा, सत्संग, मधुर वाणी, यज्ञ-दान के पुण्य, पुत्र और पशु, सब नष्ट हो जाते
हैं।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.9
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे
मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति
मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व॥
अर्थ: हे पूज्य अतिथि, आप मेरे घर में तीन रातें बिना भोजन के रहे, आपको नमस्कार है।
मेरा कल्याण हो। इसलिए प्रत्येक रात के बदले एक-एक वर माँगिए।
4. पहला वर: पिता की शांति
उसकी पहली इच्छा
अपने पिता के लिए थी: कि उनका क्रोध शांत हो जाए और जब यम उसे घर भेजें तो वे अपने
पुत्र को पहचानें। “वे तुम्हें पहले की तरह पहचानेंगे। तुम्हें मृत्यु के मुख से मुक्त
देखकर वे शांति से सोएँगे।”
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.10
शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो
माऽभि मृत्यो।
त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्
प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥
अर्थ: हे मृत्यु, मेरे पिता गौतम शांत संकल्प वाले, प्रसन्न मन वाले और मेरे प्रति
क्रोधरहित हो जाएँ, और आपके द्वारा भेजे गए मुझे पहचानकर प्रेम से बोलें। तीन वरों
में यह पहला वर मैं माँगता हूँ।
5. दूसरा वर: पवित्र अग्नि
दूसरा वर था स्वर्ग
ले जाने वाली पवित्र अग्नि। “स्वर्ग में कोई भय नहीं है,” बालक ने कहा। “वहाँ आप, मृत्यु,
नहीं हैं। कोई बूढ़ा नहीं होता।” यम ने उसे ईंट-दर-ईंट (चयन-विधि सहित) सिखाया और बालक
ने हर शब्द दोहराया। प्रसन्न होकर यम ने उस अग्नि का नाम उसी के नाम पर रखा, नचिकेता
अग्नि। और उसे रत्नों की एक झंकारती माला भी दी। “स्वर्ग बहुत समय तक रहता है, पर स्वर्ग
भी समाप्त होता है। जिस पुण्य से उसे पाया, वह खत्म होने पर मनुष्य लौट आता है। अब
तीसरा वर चुनो।”
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.12
स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति
न तत्र त्वं न जरया बिभेति।
उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥
अर्थ: स्वर्गलोक में कुछ भी भय नहीं है। वहाँ आप (मृत्यु) नहीं हैं और कोई बुढ़ापे
से नहीं डरता। भूख और प्यास दोनों को पार करके, शोक से परे होकर मनुष्य स्वर्गलोक में
आनंद करता है।
6. तीसरा वर: मृत्यु के बाद क्या होता है?
“जब मनुष्य मरता
है,” बालक ने कहा, “तब कुछ कहते हैं कि वह फिर भी रहता है। दूसरे कहते हैं कि उसका
कुछ नहीं बचता। मुझे सिखाइए कि सत्य क्या है। यही मेरी तीसरी इच्छा है।”
“देवताओं को भी बहुत
पहले इसमें संदेह था। इसे जानना सरल नहीं है। यह सूक्ष्म है। नचिकेता, कोई और वर चुन
लो। मुझ पर दबाव मत डालो। इसे छोड़ दो।” यम मना नहीं कर रहे थे। वे उसकी परीक्षा ले
रहे थे। क्या यह बालक उत्तर सुनने के योग्य था?
“यदि देवता भी संदेह
में थे, और आप स्वयं कहते हैं कि इसे जानना कठिन है, तो आपके सिवा, स्वयं मृत्यु के
स्वामी के सिवा, इसे कौन सिखा सकता है? कोई दूसरा वर इसके निकट भी नहीं आता।”
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.20
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके
नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं
वराणामेष वरस्तृतीयः॥
अर्थ: मरे हुए मनुष्य के विषय में यह संशय है: कुछ कहते हैं कि वह रहता है, और कुछ
कहते हैं कि नहीं रहता। आपसे शिक्षा पाकर मैं इसे जानना चाहता हूँ। वरों में यही तीसरा
वर है।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.21
देवैरत्रापि विचिकित्सितं
पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥
अर्थ: प्राचीन काल में देवताओं को भी इस विषय में संदेह हुआ था। इसे जानना सरल नहीं
है, यह धर्म (तत्त्व) सूक्ष्म है। हे नचिकेता, कोई दूसरा वर माँग लो। मुझ पर दबाव मत
डालो, इसे छोड़ दो।
7. प्रलोभन
“सौ वर्ष जीने वाले
पुत्र-पौत्र चुनो, पशु, हाथी, सोना और घोड़े चुनो। विशाल पृथ्वी चुनो और जितने वर्ष
चाहो जियो। इस महान पृथ्वी के राजा बनो। मनुष्यों के लिए जो भी कामना दुर्लभ है, उसे
माँग लो। रथों और संगीत वाली ये स्त्रियाँ, इनके समान कोई मनुष्य नहीं पा सकता। ये
तुम्हारी सेवा करेंगी। बस मुझसे मृत्यु के बारे में मत पूछो।”
प्रलोभन प्रलोभन
बनकर नहीं आते। वे उपहार बनकर आते हैं।
“अपने घोड़े अपने
पास रखिए। अपने नृत्य और गीत अपने पास रखिए। धन से कोई कभी संतुष्ट नहीं होता। मुझे
वही वर चाहिए जो मैंने माँगा है।” वह एक गहरी झील की तरह खड़ा रहा जिसे कुछ भी हिला
नहीं सकता था।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.23
शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व
बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं
च जीव शरदो यावदिच्छसि॥
अर्थ: सौ वर्ष जीने वाले पुत्र-पौत्र माँग लो, बहुत से पशु, हाथी, सोना और घोड़े माँग
लो। पृथ्वी का विशाल राज्य माँग लो और स्वयं जितने वर्ष चाहो उतने जियो।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.25
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके
सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न
हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व
नचिकेतो मरणं माऽनुप्रार्क्षीः॥
अर्थ: मनुष्यलोक में जो-जो कामनाएँ दुर्लभ हैं, उन सबको इच्छानुसार माँग लो। रथों और
वाद्यों सहित ये सुंदरियाँ मनुष्यों को प्राप्त नहीं होतीं। मेरे द्वारा दी गई इनसे
सेवा करवाओ, पर हे नचिकेता, मृत्यु के विषय में मत पूछो।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.26
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्
सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव
वाहास्तव नृत्यगीते॥
अर्थ: हे यम, ये भोग कल तक रहने वाले हैं और सब इंद्रियों का तेज क्षीण कर देते हैं।
सारा जीवन भी अल्प ही है। आपके ही रहें ये वाहन (घोड़े), आपके ही रहें नृत्य और गीत।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.27
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत् त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव॥
अर्थ: धन से मनुष्य कभी तृप्त नहीं होता। आपके दर्शन हो गए हैं, तो धन तो हमें मिल
ही जाएगा और जब तक आप चाहेंगे तब तक जिएँगे भी। परंतु मेरा वरणीय वर तो वही है।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.1.29
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति
मृत्यो यत् साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत्।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते॥
अर्थ: हे मृत्यु, जिसके विषय में लोग संदेह करते हैं, उस महान परलोक के रहस्य को हमें
बताइए। इस गूढ़ तत्त्व में प्रविष्ट वर को छोड़कर नचिकेता दूसरा कोई वर नहीं माँगता।
8. श्रेय और प्रेय
“श्रेय एक चीज़ है।
प्रेय दूसरी। बुद्धिमान श्रेय को चुनते हैं। मूर्ख प्रेय को चुनता है। दोनों हर किसी
के पास आते हैं। बुद्धिमान दोनों को वैसे अलग कर लेता है जैसे हंस दूध को पानी से अलग
करता है। यही विवेक है।”
“नचिकेता, तुमने
हर सुख को देखा और उसे छोड़ दिया। तुमने धन का वह मार्ग नहीं लिया जिसमें इतने लोग
डूब जाते हैं।”
मंत्र — कठोपनिषद् 1.2.1
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते
उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु
भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥
अर्थ: श्रेय (कल्याणकारी) अलग है और प्रेय (प्रिय लगने वाला) अलग। दोनों भिन्न उद्देश्य
वाले होकर मनुष्य को बाँधते हैं। जो श्रेय को ग्रहण करता है उसका भला होता है, और जो
प्रेय को चुनता है वह लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाता है।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.2.2
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ
सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो
वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
अर्थ: श्रेय और प्रेय दोनों मनुष्य के पास आते हैं। धीर पुरुष दोनों को भली-भाँति परखकर
अलग-अलग पहचानता है। धीर प्रेय की अपेक्षा श्रेय को चुनता है, और मंदबुद्धि योग-क्षेम
(सुख-सुविधा) के लिए प्रेय को चुनता है।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.2.3
स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च
कामानभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः।
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो
यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः॥
अर्थ: हे नचिकेता, तुमने प्रिय और प्रिय रूप वाली कामनाओं पर विचार करके उन्हें छोड़
दिया। तुमने धन की उस राह को नहीं अपनाया जिसमें बहुत से मनुष्य डूब जाते हैं।
9. यम का उत्तर: आत्मा कभी नहीं मरती
और तब यम ने प्रश्न
का उत्तर दिया। जीवन शिष्य है। मृत्यु गुरु है। आत्मा, जो जानने वाला है, कभी जन्म
नहीं लेता और कभी मरता नहीं। शरीर के मारे जाने पर वह नहीं मारा जाता।
पीछे मुड़कर सोचिए।
जो बच्चा आप थे, वह चला गया। वह युवा भी चला गया। दर्पण में दिखने वाला चेहरा बदलता
रहता है। पर जिसने यह सब देखा है, वह एक दिन भी बूढ़ा नहीं हुआ। कृष्ण भगवद्गीता में
लगभग यही शब्द कहते हैं।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.2.18
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं
कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ: यह ज्ञानस्वरूप आत्मा न कभी जन्म लेता है और न मरता है। यह न कहीं से आया है
और न कुछ बना है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी
नहीं मारा जाता। (गीता 2.20 में लगभग यही श्लोक है।)
10. आत्मा चुनने से मिलती है
“यह आत्मा न उपदेश
से मिलती है, न चतुराई से, न बहुत विद्या से। यह उसे मिलती है जो इसे चुनता है। उसी
के सामने यह स्वयं को प्रकट करती है।” मृत्यु ने उससे बार-बार यही कहा था: “चुनो।”
संस्कृत में वर का अर्थ यही है: चुनी हुई वस्तु। उसने केवल यही चुना था।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.2.23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष
आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
अर्थ: यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न बहुत सुनने से प्राप्त होता है। यह जिसे
वरण करता है (जो इसे चुनता है), उसी को प्राप्त होता है; उसके सामने यह आत्मा अपना
स्वरूप प्रकट कर देता है।
11. रथ
“आत्मा को रथी जानो
और शरीर को रथ। बुद्धि सारथी है, मन लगाम है, इंद्रियाँ घोड़े हैं, और संसार वह मार्ग
है जिस पर वे दौड़ते हैं। लगाम ढीली छोड़ दो तो इंद्रियाँ जंगली घोड़ों की तरह भाग
निकलती हैं और रथ को, और उसके साथ रथी को, जहाँ चाहें घसीट ले जाती हैं। लगाम थाम लो
तो वही घोड़े उसे घर पहुँचा देते हैं। जिसकी समझ मन की लगाम थामती है, वह यात्रा के
अंत तक पहुँचता है, सर्वव्यापी विष्णु के परम पद तक।”
अधिकतर दिन घोड़े
हमें चलाते हैं। एक आवाज़, एक चीख, एक लालसा, और वे दौड़ पड़ते हैं, और हम उसे चुनना
कहते हैं। पर यह मार्ग कहाँ समाप्त होता है? घोड़ों के पार जाइए, लगाम के पार, सारथी
के पार। केवल रथी बचता है। यात्रा वहीं समाप्त होती है जहाँ से शुरू हुई थी: उसमें
जो आरंभ से ही रथ में बैठा था।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.3.3–4
आत्मानं रथितं विद्धि शरीरं
रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि
मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु
गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥
अर्थ: आत्मा को रथी (रथ में बैठने वाला) जानो और शरीर को रथ। बुद्धि को सारथी जानो
और मन को लगाम। इंद्रियों को घोड़े कहा गया है और विषयों को उनके मार्ग। शरीर, इंद्रिय
और मन से युक्त आत्मा को मनीषी भोक्ता कहते हैं।
मंत्र — कठोपनिषद् 1.3.9
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः
परमं पदम्॥
अर्थ: जिस मनुष्य का सारथी विवेक-बुद्धि है और जिसने मन की लगाम थाम रखी है, वह मार्ग
के पार पहुँचता है, विष्णु के उस परम पद को प्राप्त करता है।
12. उठो, जागो
“उठो, जागो। हममें
से अधिकतर लोग खुली आँखों के साथ सोए हुए जीवन बिताते हैं। जो जागे हुए हैं उन्हें
खोजो और उनसे सीखो। और सावधानी से चलो। यह मार्ग छुरे की धार है। यह लंबा नहीं है,
पर संकरा है। क्षण भर के लिए ध्यान चूका तो तुम फिर स्वप्न में गिर जाते हो।”
मंत्र — कठोपनिषद् 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य
वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति॥
अर्थ: उठो, जागो, श्रेष्ठ पुरुषों को पाकर (उनसे) ज्ञान प्राप्त करो। कवि (ज्ञानी)
कहते हैं कि वह मार्ग छुरे की तेज धार के समान है, जिसे पार करना कठिन है।
13. एक अग्नि, अनेक रूप
जैसे एक अग्नि हर
उस रूप का आकार ले लेती है जिसमें वह प्रवेश करती है, वैसे ही एक आत्मा हर रूप का आकार
ले लेती है और उनसे परे भी है। वही अग्नि मंदिर के दीपक में जलती है, रसोई के चूल्हे
में, और चिता पर। एक में सौम्य, दूसरे में प्रचंड। वह जिसे जलाती है उसी का आकार ले
लेती है। पर अग्नि एक ही है। आप और आपके पास खड़ा अजनबी दो दीपक हैं। अग्नि एक है।
मंत्र — कठोपनिषद् 2.2.9
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥
अर्थ: जैसे एक ही अग्नि भुवन में प्रवेश करके प्रत्येक रूप के अनुरूप हो जाती है, वैसे
ही सब प्राणियों का एक ही अंतरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो जाता है और उनसे बाहर
भी है।
14. दृष्टि को भीतर मोड़ना
स्वयंभू ने इंद्रियों
को बाहर की ओर खोला, इसलिए हम बाहर देखते हैं, भीतर नहीं। पर कोई विरला, स्थिर पुरुष,
अमरता की चाह में, अपनी आँखें पीछे मोड़कर आत्मा को देख लेता है। वह प्रकाश आपकी अपनी
आत्मा है। आप उसे सूर्य के प्रकाश से नहीं देखते। आप सूर्य को उसके प्रकाश से देखते
हैं। रंगमंच के दीपक का ध्यान कीजिए। वह आश्रयदाता को, दर्शकों को और नर्तक को समान
रूप से प्रकाशित करता है। और जब नृत्य समाप्त हो जाता है और सब घर चले जाते हैं, तब
भी दीपक जलता रहता है।
मंत्र — कठोपनिषद् 2.1.1
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात्
पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥
अर्थ: स्वयंभू ने इंद्रियों को बाहर की ओर जाने वाला बनाया, इसलिए मनुष्य बाहर देखता
है, अंतरात्मा को नहीं। कोई विरला धीर पुरुष, अमरता की इच्छा से, दृष्टि को भीतर मोड़कर
आत्मा को देख लेता है।
मंत्र — कठोपनिषद् 2.2.15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य
भासा सर्वमिदं विभाति॥
अर्थ: वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, न चंद्रमा और तारे, न ये बिजलियाँ चमकती हैं,
फिर इस अग्नि की क्या बात? उसी के प्रकाशित होने पर सब कुछ उसके पीछे प्रकाशित होता
है; उसी की ज्योति से यह सब प्रकाशित होता है।
15. कामना ही मृत्यु का बंधन है
हमें मृत्यु से जो
बाँधता है, वह संसार नहीं है। वह हमारे हृदय की चाह है। जब हर कामना छूट जाती है, तब
मरणशील मनुष्य अमर हो जाता है। इस जीवन के बाद किसी स्वर्ग में नहीं, यहीं। उसके पिता
ने उसे मृत्यु को दिया था। और मृत्यु ने उसे वह एक उपहार देकर लौटाया जो कोई पिता नहीं
दे सकता था।
मंत्र — कठोपनिषद् 2.3.14
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा
येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र
ब्रह्म समश्नुते॥
अर्थ: जब हृदय में बसी हुई सभी कामनाएँ छूट जाती हैं, तब मरणशील मनुष्य अमर हो जाता
है और यहीं ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
16. समापन प्रार्थना: शांति पाठ
मंत्र — कठोपनिषद् शांति पाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ: ॐ, वह परमात्मा हम दोनों (गुरु-शिष्य) की रक्षा करे, हम दोनों का पालन करे, हम साथ मिलकर पराक्रम करें। हमारा पढ़ा हुआ तेजस्वी हो, हम आपस में द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति।
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